मीराबाई

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मीराँबाई

मीरा रो जीवणवृत्त 
(प्रस्तुति- भूपतिराम बदरीप्रसादोत)
पृष्ढिका:- 
इण धरती उपजंत रा पांच दूहा राजस्थानी धरती रो ऐड़ो चित्राम आंखां आगे ऊभी करे के जिण मांय वीरत भक्ति ने सिंगार री त्रिवेणी वहे। कांई अठैरा शूरीवर तो कांई अठैरी सतियां, कांई अठैरा भक्त को कांई अठैरा दातार अर कांईं अठैरी नेह निझरती लुगायां तो कांई अठैरा लाड-लाड़वणिया पुरुष-पटाधर, सैगं एक सूं सवाया। कलम ने करवालरा धणी साहित्यकरां रो तो केहवणकोई कांई ? उणा आपरे रगत-रूसनाई सूं ओजसवाल साहित्य रो निर्माण किनो। संसार रे किणी ई साहित्य मांय इणरो जोटो जोयो  नी मिले ! अठैरी थोड़ी पण घण उपयोगी ने निरोगी वसन्पति, ऊजणा धोरा, ऊंडा निरमला जल, रणियामणा भाखर, वेता वाहला, पीलू ने ढालू सैगां री वात ई निराली है। ए पांच दूहा इण भांत है- 
केसर नह निपजै अठै, नह हीरा निपजंत। 
सिट कटियां, खग सांभणा, इण धरती उपजंत।।1।। 
चीतांलकी नार चक्ख, कामण घणा करंत। 
पति पड़ियां सत राखणु इण धरती उपजंत।।2।। 
संतां री वाणी सुगम, भगती ज्ञान भरंत। 
ईसरा परमेसरा, इण धती उपजंत।।3।। 
पाछी पानी  नी करी, दाता देवण दत्त। 
रज रज रलियामणा, इण धरती उपजंत।।4।। 
खेजड़ फोग कुमट घणा, कैर जाल वरांग। 
नेह निजता मानरवा, इण धती उपजंत।।5।।
जैड़ा अठैरा वीर अैड़ा ई अठैरा भगत ने संत। एक एक सूं चढियाता । इण भगतां मांय मीरा रो नाम कैलाश जिसो ऊंचो ने धवल। मीरा रे नाम सूं आखो देश परिचित। इंयु भी केहीज सके के मीरा आंपांणी-राजस्थानरी ओलखाण। इणरा भजन अमृत रस सूं लबालब। किणी एक जात के संप्रदायने नी, पण सगली मानवजात ने प्रभावति करे। साथे साथे इणारा भजनां मांय जुग-जुगांतरां री नारी सहज कोमलता, विह्वलता ने निरमलता रे सागे, इणारी डिढता  अर प्रताड़ित-पीड़ित नारी रा दरसण हुवे। इणरा भजना मांय प्रेम रो दरियाव ऊंची हिलोलां लेवे जिण मांय बूडण सूं भवसागर तरीजे। अचंभारी वात तो आ के इणां मांय जिके बूडे वे तो तरे अर जिके कांठे बैठा रेहवे वे खरेखर बूड़े। जैपर रा राज्याश्रित हिंदी कवि बिहारी आपरी सतसई मांय इणीज भाव रो एक दूहो कह्यो है :-
या अनुरागी चित की गति समझै नहीं कोय। 
ज्यों ज्यों बूडे श्याम रंग, त्यां त्यां उज्वल होय।।
कालजयमी मीरा पण श्याम-रंग मांय ऐड़ी बूड़ी के उण खुद रो उद्धार कियो ई पण साथे साथे इण रंग मांय बूडणरी प्रेरणा देयने घणाने तार दीना।
आज सूं बे-दायका पेहला मीरा रे जीवण-वृत्त संबंधी घणी भ्रांत धारणावां ही। वा कठै जलमी ? किणरे साथे उणरो ब्याव हुओ ? उणरा गुरु कुण हा ? उणरी काव्य भाषा किसी ही ? उणे कितरा पदां री रचना कीवी ? उणरी भक्ति रो स्वरूप कांई हो ? आद घणा सवालां रे जवाबां मांय विद्वान अस्पष्ट हा। पण हमें घणी शोधां सूं घणा नवा तथ्य उजागर हुआ है।
मीरा रो पितृ कुल :-
मेड़ता माथे राजकरण सूं अठैरा राठौड़ मेड़तिया कहीजिया। इणीज राजकुल मांय मीरा रो जलम व्हियो ने इणीज सारू मीरा आपरे सासरिया मांय मेड़तणी वाजती। राजपूतां मांय ओ रिवाज है के बेटी परणीजर सासरे जावे तो आपरे पितृकले सूं ओलखीजे।
राव जोधाजी वसायो ने इणारा चौथा कंवर राव दूदा मालवा रा शासक सूं मेड़ता खोस र आपरे हस्तक कीनो। धीमे धीमे उणा आजू-बाजूरा 360 गामां माथे आपरो अधिकार करने जूना मेड़ता कने नवो मेड़ता वसायो। राव दूधा घणा जोरावर अर भागशाली। इणीज राव दूधा रा चौथा कंवर रतनसी (रतनसिंघ) री इकलौती संतान मीरा ही। इण भांत मीरा राव दूदारी पोती हुई। मीरा री माता रो नाम वीर कंवरी हो अर वे झाला अल्लरी राजपूताणी हा। जदके दूजालोग माने के मीरा री माता रो नाम कुसुमकंवर हो अर वा टाक राजपूताणी ही। पण घणा विद्वान वीरकंवरी रे पण मायं आपरी राय देवे। मीरा रो जलम इणीज दंपति सूं वि.सं. 1561 मांय हुआ हो।
मीरा रो जनम स्थल:- 
मीरा रे जलम स्थान ने लेय र विद्वान एक मत नी हा। कोई कुड़की माने तो कोई चौकड़ी। कोई बाजोली माने तो कोई मेड़ता। पण हमे विद्वान एकमत हुआ है अर मानण ढूका है के मीरा रो जलम मेड़ता मांय ईज हुओ। मेड़ता रे इतिहास सूं तो प्रमाणित है ईज पण हेठै लिखा कीं बारला साक्ष्य ई इण वात री साक्षी भरे :-
मीरा जनमी मेड़ते भगति करण कलि काल (मीरा री परची) 
माता पिता जनमी पुर मेड़ते प्रीत लागी हरि पीहर मांही। (राघवदास री भक्तमाल) 
मेड़ते जनमभूमि झूमि हरि नैन लगे (नामादास री भक्तमाल)
मीरा रो बालपण ने ब्याव :-
रतनसी तो खनवा री रणभूमि मांय खेत रह्या, पण मीरा रे ब्याव तांई उणरी माता वीरकंवरी जीवता हा। ऊगरी बाजरी रा बोकणा ई केहवे री केहवत परमाण रे राव दूदा मीरा मांय महानता रा लक्षण जोया। इणीज कारण उणआ घणआ जतन लाडकोड सूं मीरा रो पालणो-पोषणो आपरी निजरां सामी मेड़ता मांय ईज करायो। रा व दूदा परम भागवत। वे राठौड़ां री कुलदेवी चामुडारी उपासना साथे चारभुजा धारी भगवान विष्णु रा परम उपासक वणिया। उणा तो मेड़ता मांय चारुभुजा रो मिंदर ई वणायो। इण वातावरण रो असर मीरा रा बालमन माथे गहरो पड़ियो। ओईज कारण हो के बालपण सूं मीरा रो मन श्रीकृष्ण कांनी सहज रूप सूं आकृष्ट हो। वो वतो पुष्टो हुओ उण प्रचलित कथा सूं जिणमांय मेड़ता मांय बारे सू े एक जान आवरणरो वर्णन है। वर राजा घडो ़माथे सवार हो, फूटरा कपड़ा ने गैणआ-गांठा पहरियोड़ो हो, ढोल, नगारा-निसाण धुरीज रह्या हा ने चोबदार साथे चालता हा। निरा कोतल घोड़ा ई आगे चालता हा। कहवीजे है के उण टैम मीरा बाल सहज भाव सूं आपरी माने पूछीयो के म्हारो वर कुण ? माता श्रीकृष्ण री मूरत कांनी आंगली कीवी। बस, वा घड़ी ने वो पल मीरा पाछो वलङर नी जोयो। वा तो तनमन सूं सूं आपार गिरध री सेवा मांय समर्पति हुयगी। मीरा री भगती सूं राजी हुय र राव दूदा मीरा सारू एक जुदो कक्ष महलां मांय वणाय दियो, जिको श्यामकुंज रे नाम सूं प्रख्यात है। अठै ईज रात-दिन आपरे गिरधर-गोपाल री पूजा-अर्चना मांय मीरा लीन रहवती। पेहला तो मीरा व्यावरो विरोध कीनो। उण तो बालपण सूं ही श्रीकृष्णने आपरा पति स्वीकार्या हा तो दूजो सांसारिक पति कींकर स्वीकार सके ? ने मोटी वात तो आ ही के ब्याव करने माया-जांल मांय फसणो उणरो अभीष्ट कोनी हो। पछे वडीलांरे घणे दबाव सूं अर खास कर र उणा मानीता दादाजी राव दूदा जद ओ समझायो के मीरा कृष्ण तो सर्वातंरयामी है। वे तो घट घट मांय वसे। थारा मूरतिया भोजराज मांय पण ए ईज विराजे। थूं इण दीठ सूं क्यूं नी विचारे ? मीरा रा मन मांय राव दूदा री वात जमगी केहवो के पछे दूदाजी रे लाड रे वशीमूत हुयने उण हामल भर दी। इण भांत मेवाड़ाधिपति राणा सांगा (संग्रामसिंघ) रा कुंवर भोजराज साथे बारे वरस री अवस्था मांय वि.सं. 1573, आखातीजने मीरा रो ब्याव धामधूम सूं हुयगो। फेरा फतां बखत मीरा कृष्ण री मूरत साथे लेयने फेरा फरिया।
मीरा रो वैधव्य :
भोजराज मीरा रा रूप गुण अर भगती सूं घणो प्रभावित हो, पण कहवीजे के जद वो पेहली बार महलां गयो तो मीराने पर-पुरुष साथे वातां करतां सांभलियो। उणरे तो लाय लागगी जद हबीड करतां किंवाड़ खोलिया तो उण एक प्रचंड प्रकाश-पुंज जोयो। उणरी आंखां मीचीजगी अर वो सागे पगे पाछो वलियो। इण बणाव पछे भोजराज रे मन मांय मीरा कांनी वत्ती श्रद्धा जागी। उणने खातरी हुयगी के मीरा परम भगत है ने भगवान साथे घरोपो धरावे। पछे भोजराज राणा सांगी री हयाती मांय शरीर छोड़ दियो।
मीरा रो वैधव्यो घणो करूण रह्यो। पेहला तो सती हूवणू सारू मीरा माथे जोरदार दबाण घालीजियो। कांई राज-परवार रा लोग ने कांई प्रजा-जन सगलां रा व्यग्यं बाणां ने सहता थकां मीरा इण प्रस्ताव ने अस्वीकारियो अर टस सूं मस नी हुई। रूढिचुस्त लोग मीरा ऊपर गीधड़ां ज्युं टूट पड़िया। उण सैंगां रा मेहणा सह्या :-
राणा वरजे राणी वरजे वरजे सब परिवारी। 
कुंवर पाटवी सोई वरजे, अर सहेल्यां सारी।।
पण वा तो अचलं। उण गायो के :-
गिरधर गास्यां सती न होस्यां, मन मोह्यो घणनामी। 
पछे तो मीरा के कष्टो रो पार नी रह्यो। महाराणा रतनसिंह पछे विक्रमादित्य मेवाड़ री गादी बैठो। वो घणो क्रुर अंहकारी न दुराचारी शासक हो। मीरा री प्रभुभगती री प्रवृतियां, उणरे हिया मांय शूल ज्यूं खटकती। चरणामृत रे नाम सूं हलाहल मेलणो अर शालिग्राम रे नाम सूं साप मेलणो, उण दुराचारी सारू कांई नवाई नी हा। जठै राज सारू बाप बेटाने अर बेटो बापने मार देवे, उण काल रे मांय ऐड़ी घटनावां रो हूवणो, अचरजरी वात कोनी। चवड़े नी तो छाने ईज विरोधी री हत्या उण संघर्ष री चरम परिणति हुय सके खास कर र जद मीरा रो संत समागम कीरतन अर नरतन, राज-मरजादा री साफ उलंघण हुवे। मीरा तो गायो- 
लोकलाज कुलकाण जगत री, दी बहाय जस पाणी।
मेवाड त्याग :-
भगती मांय व्यवधान आणे सूं तथा राज अर दूजा लोगां रे असह्य व्यवहार सूं आंती आयङर मेवड़ा सूं पुष्कर तीरथ हुवतां सं. 1511 मांय वीरमदेव रे तेड़े सूं तेड़ागरां साथे वीरा मेउता आयगी। अठै मीराने किणी भांत रो कष्ट नी हो। पण इंयु लागे के दुसमणा साथे निरंतर जुद्ध री स्थिति वणियोड़ी रहवणए सूं अठैई मीरा ने चाहीजे जैड़ी शांति नी मिली। जोधपुर रा मालदेव रा असह्य हुमला रे कारण, मेड़ता छोड़ङर वीरमदेव आपरे परिगह साथे अजमेर गयो परो. मीरा ई सगला रे साथे अजमेर गई।
वृदावन वास:- 
पुष्कर तीर्थ करने सं. 1595 मांय वा आपरे इष्ट देव री जनमभूमि अर लीला भूमि मथुरा-वृंदावन गई। राजस्थान करतां ओ घणो लीलो प्रदेश हो। जमनाजी जिसी पुण्य सलिला रा दरसण ने इण प्रदेश री सुरम्यता, उणरो मनमोहन लीनो। घणा पदा मांय मीरा वृंदावन रो फूटरो प्राकृतिक-चित्रण कीनो है। पण अठैई वा घणी ताल नी रह सकी। फकत तीन वरसां रे वृंदावन प्रवास मांय, मीरा एकर उण टैम रा ख्यातनाम ज्ञानी भगत जीव गोसांई सूं मिलण गई। उद्धव ज्युं ज्ञान रा गरब मांय उणा कहवाड़ियों के म्हूं किणी स्त्री सूं मिलूं कोनी। मीरा उत्तर वालीयो के म्हने तो आज ईज ठाह पड़ी के ब्रज मांय श्रीकृष्ण सिवाय कोई दूजो पुरूष ई है। मीरा रे इण दार्शनिक उथला सूं जीव गोसाई रो घमंड चूर चूर हुयगो ने वे सामा पगे मिलण गया। जीव गोसाई सूं मिलण री कथा, भगत रे नाम सूं प्रचलित दंभ ने विदारे। भगती मांय तो सैंग बराबर। उठै ऊंच-नीच, नर-नारी अर वर्ण-वर्ग रो भेद कोनी रेहवे। मोटी वात तो आ के पुष्ठिमांग मांय एकला भगवान कृष्ण ईज पुरुष गिणीजे ने बीजा सगला जीव स्त्री। तोई जद जीव गोसाई कह्यो के म्हुं किणई स्त्री सूं नी मिल संकू तो मीराने आपरे स्त्रीपणा रो स्वाभिमान रो ख्लाय आयो। इण घटना रे पणे उणरो स्त्रीत्व वत्तो तेजस्वी हुओ।
मीरा रो द्वारका गमन :-
मीरा आपरे इष्टदेव री लीलाभूमि त्याग र  कर्मभूमि द्वारका कांनी पग उपाड़िया। डॉ. महेन्द्र दवे आपरे लेख मीरा की गुजरात यात्रा मांय गुजरात (द्वारका) जात्रा रो जिको मार्ग बतायो है, वो साचो कोनी। वो तो मुसलमान शाकांरो विजयमार्ग है के पछै जैन तीर्थ-यात्रियां रो जावणरो मार्ग है। ब्रजमंडल, अयोध्या, मगध अर बंगाल वगेरा तीर्थ-यात्रियां रो मारग तो मथुरा-आमेर-अजमेर-पाली-भीनमाल-सांचोर-धरणीधर (ढेमा गाम मायं आयोड़ो चावो तीरथ। ओ गुजरात मांय है।) जामनगर-द्वाराका हो। मीरा इणीज मारग सूं पद रचना करती गावती अर नाचती, श्रीहरि के द्वारका धाम गई ही। डॉ. दवे रे मारग मांय तो धरणीधर रो नाम ई कोनी जद के द्वारका पेहला अठै री छाप लगावणो जरूरी मानजतो. द्वारका मांय मीरा नव वरस रही ने अठैइज कीरतन करतां सं. 1604 रे लगेटगे, उणरा प्राण रणछोड़राय मांय विलीन हुयगा। उण टैम मीरा री ऊमर फक्त 43 वरस री ही।
नैनी ऊमर मोटा काम :-
व्यक्ति की ऊमरने उणरी कारकिरदी सूं कांई लेणा-देणा कोनी। संसार रा घणा महापुरुष ऐड़ा हुआ है, जिके साव नैनी ऊमर मां सरगां सिधारग। ा आपणा देश मांय आद शंकराचार्य अर आधुनिक जुगमाय स्वामी विवेकानंद जैड़ा घणा उदाहरण है जिके साव नैनी ऊमर मांय अदभुत काम करगा। आपणी माता-भाषारो उद्धार करणियो इटाली रो चावो विद्वान डॉ. तैस्सितोरी पण साव नैनी ऊमर मांय काम करतो करतो बीकानेर मांय पोढगो। ऐड़ा लोगां ने किणी टोला री ई जरुरत नी ही। वे एकलाईज घणा सक्षम हा। मीरा ई ऐड़ा पुरुषां मांय एकली ही ने सवाई वात तो आ ही के वा तिरिया जातरी ही। मध्यकाल मांय लुगायां री अवदशां सूं तो आंपां वाकब ई हां। पण धिन है मीरा ने। वा आपरी लगन, निष्ढा, त्याग, साहस अर भगती सूं लोक-पूज बणगी। ठेठ अंतस रे उंडाण सूं अद्भुत उणरा पद ऐड़ा तो व्यापक हुआ के मीरा देश रा सगला प्रदेशां मांय उठैरी भाषावां मांय गावीजण लागी। ऐड़ो सनमान कचाद ई कोई दूजे भक्त कविने मिलियो हुवे।
मीरा रा गुरु :-
मीरा रा शिक्षा गुरु पं. गजाधर हा। वे ईज मीराने आखर ज्ञान रे साथे साथे अध्यात्म री शिक्षा दीवी। ब्याव व्हिया पछे इण नैष्ढिक ब्राह्मण ने आपरे साते मेवाड़ लेयगी ने उठै बे हाजर वीघा पपीयत जमी बखसी। मीरा इण पंडित ने प्यासरी पदवी ई प्रदान कीवी। पेचीदी बात तो आ है के मीरा दीक्षा गुरु किया के नी ? बालरी खाल खींचणवाला विद्वान आप आप रे मतानुसार एक नी, नव गुरुवांरा नाम लेवे। इण खांचातांण रो मूल कारण ओ है के मीरा जिसी उच्चकोटिरी भक्त सूं सगला संप्रदाय आपोर सीधो संबंध बांधणो च्हावता हा ने इणीज कारण गुरुवां री संख्या वधती वधती नव तांईं पहुंची। इण गुरुवां रा नाम इण भांत है। 
(1) रामनंद (2) रैदास (3)हरदिसा दरजी (रैदासी) (4) माधवपुरी (5) चैतन्य महाप्रभु (6) रघुनाथदास (7) जीव गोस्वामी (8) रुप गोस्वामी (9) विट्ठल (रैदासी- डॉ. हीरालाल महेश्वरी विष्णओई संप्रदाय रा प्रवर्तक जांभोजी ने मीरा रा दसमा गुरु थरपिया है। पण अठै वे गोत खायगा। मीराजी लियो मिलाय चरण मांय मीराजी ईश्वर रो पर्याय है नी के मीरा नाम रो सूचक। मीरा रे गुरुवां रे संबंध मांय गुजराती शोधवेत्ता अर विद्वान डॉ. मंजुलाल मजमुदार सफा लिखियो है के पोतानो संबंध श्रीकृष्ण  साथे, बारोबार सीधोज कोई पण गुरुनी दरम्यानगिरि वगर तेमणे स्थापन करी दीधो हतो। खरेखर ऊपर दरसायोडा किणीने ई मीरा गुरु बणाया हुवे उणरा पुख्ता प्रमाण कोनी मिले। इण किणी सूं मीरा गुरु-दीक्षा लीवी कोनी ओईज मानणो योग्य है। जिणरा गिरधर गोपाल ईज सर्वस्व हुवे, उणने किणी गुरी री जरूरत ई क्यूं पडे। मीरा तो तन्मय हुई ने गायो, म्हारा तो गिरधर गोपल दूसरो न कोई।
मीरा नाम:- 
आपरे एक लेख मीराबाई की ऐतिहासिकता मांय डॉ. हुकुमसिंह भाटी लिख्यो है उणरे बचपन रो नाम पेमलकंवर हो।
जो ओईज मीरा रो मूल नाम हुवे तो मीरा नाम कीकर ने कद पड़ियो ? इण सवाल माथे विद्वान मून झालियोड़ा है। आंपां ओ मान र नहचो करां के पेमलकंवर रो अपर नाम ईज मीरा हो पण विद्वानं तो इणने लेय र घणो बौद्धिक विलास कर्यो है, द्राविड़ी प्राणाम कर्यो है। म्हने ओ  लागे के मीरा रे व्यक्तित्व अर कृतित्वन सूं नाम रो कोई खास लेणओ देणओ कोनी। खोटा अफाला खावण सूं कोई मतलब कोनी। आंपांने तो मीरा रे पदांरी भाषा ने उण मांय अभिव्यक्ति भक्ति रसूं सूं सराबोर मीरा रे भावां सूं मतबल है।
मीरा री निडरता:- 
नारी स्वतंत्रता रा इण जुग मांय ई जद लुगायां निडर नी वण सकी तो घोर सामंती जुग मांय मीर रो निडर, साहसी अर डिढ निश्चयी हूवणो एक मायनो राखे. उण जैड़ी क्रांतिकारी अर सहन शीला नारी रो दाखलो आंपांने कठै मिलसी ? विपरीत संजोगांमांय वा सामा-चढाण चढी ने पार उतरी। अनेक भांतरा नारी प्रतिबंधां रे मध्ययुग मांय मीरा एकला हाथ जूझूणवाली हेवल-वीर ही। उणरे जीवणरो रो मुख्य उद्देश आपरा इष्टदेव कृष्ण री भगती करणो हो ने इणरे आडा आवणवाला सगला विरोधां ने वा प्रसन्न-वदन झेलती रही। एक बात फेर। मीरा मध्यकालीन सामंती व्यवस्था री पीड़ित नारी अर भक्त कवयित्री ही। मीरा ने समझण सारू उणरे पीड़ित नारी ने समझणओ घणओ जरूरी है। ने जो आंपां ओ स्वीकारां के भक्त अर कवि हुवण सारू जात-पांत, ऊंच-नीच, वर्ग-वर्ण अर मान-प्रतिष्ठा छोड़णा पड़े. तो मीरा पण एक भक्त कवयित्री ही उणरे लोक-लाज ने कुलरी परंपरा तोड़ण मांय आपत्ति क्युं ? भक्त रे वास्ते तो सैंग समान।
मीरा रा पिता रतनसी अर उणारी वीरगति :-
महाराणां सांगा ने बाबर वच्चे सन 1527 मांय खानवा रो जबरो युद्ध हुआ। नजीक रा सगा हूवण सूं राव वीरमदेव, उणरौ नैनो भाई रायमल अर मीरा रा पिता रतनसी इण युद्ध मांय भाग लीनो। वीरमदेव रो घायल हुय र बच निकलिया पण रायमल अर रतनसी वीरगति पामी। दूजे वरस सन 1528 मांय राणा सांग ई परलोकगामी व्हिया।
महाराणा विक्रमसिंह अर मीरा रे साथे उणरो दुर्व्यवहार:- 
सं. 1588 मांय विक्रमादित्य महाराणा हुओ। उणरा उदंड वेवार सूं. खुशामदियांने छोड़ र सगला सरदार आप आपरे ठेकाणे परा गयां इंयु तो वो पेहला सूं ईज मीरा साथे खार खायोड़ो हो, पण अबे महाराणा वणिया पछे तो उणारी दुष्टता रो पूछणओ ई कांई ? राजाराणई हुवता थकां साधूड़ां री संगत ? इणने आपरे विधवापण रो ई ख्याल कोनी ? भाभी हुआ तो कांई घर री मरजादा तो  नी ईज ओलंगीजे ? उणे तो मीरा री पजवणी शुरु कीवी। उठे तांई के महलां रे ताला जड़ दीना। 
पेहरो बिठायो, चौकी मेली तालो दियो जड़ाय।
अठताई केहवजी के एकारूं उदाबाई (मार रा नणद) ने विक्रमादित्य दोनूं मिलङर मीरा रे इष्टदेव गिरधर गोपाल री मूरत छिपाय लीवी। मरूत नी मिलण सूं मीरा तो बेहाल। आऊं झरता नेणा सूं उण आपरा गिरधर गोपाल री प्रार्थना कीवी। थोड़ी वार पछे आंखा उघाड़ी तो भगवान री मूरत सिंघासण माथे विराजियोड़ी लाधी। चरणामृत रे नाम सूं जहर मेलणो अर सालिग्राम रे नाम सूं साप मेलणो जिसा दुर्व्यवहार सूं ई मीरा हार नी मानी। वा तो सतसंगां अर भगती मांय लीन रही। उण गायो। 
राणा विष रो प्यालो भेज्यो, चरणाम्रत कर पी जाणा। 
कालो नाग पिटार्यां भेज्यो सालगराम पिछाणा। 
मीरा गिरधर प्रेम बावली, सांवलियो वर पाणा।
थाक र विक्रमादित्य मीरा ने मारण रो प्रतय्न कियो, पण उण मांय ई निष्फलता हाथ लागी। खिझाणो घमो, पण वश चाल्यो कोनी। दृष्ट आपरी दृष्टता छोड़ता हुवेला ? वो तो आपरी कुचमाद अर कुचरणी सूं बाज नी आयो। आंती आय र मीरा मेवाड़ त्याग दीनो।
भगत मीराने सतावण रो कुफल मेवड़ा ने तुरत मिलियो। मेवाड़ चोफकेर सूं आपदावां सूं घिरीजगो। गुजरात रो बादशाह बहादुरशाह मेवाड़ माथे चढ आयो। दूजो जौहर हुओ। विक्रमादित्य मार्यो गयो। बनवीर महाराणा बणियो। उणरा वेवारां सूं तंग आयने सरदार उदैसिंघ ने महाराणओ वणायो। अठी ने अकबर चित्तौड़ माथे हल्लो करीनो ने चित्तौड़ माथे आपरो झंडो फहरायो। जयमल ने पता री वीरता ऐले गई। दूजी कांनी प्रकृति ई रीसाणी अर मेवाड़ दुष्काल रो शिकार हुओ। प्रजा ने हमे खातरी हुयगी के भक्त शिरोमणि मीराबाई रे जावण सूं ईज मेवाड़ माथे ओलाओल कष्टां री झड़ी लागगी।
मीरा ने तेड़णो:- 
भजनां राची मीरा इण टैम द्वारकवासी ही। महाराणा उदैसिंघ की बामणां अर सरदारां ने मीराने तेड़ण सारू द्वारका मेलिया। पण मीरा दबाव रे वश नी हुई। अंत मांय उण क्होय के जो रणछोड़राय आज्ञा कसी तो अवश्य चालूंला। मीरा आज्ञा वेण चाली अर अठैईज समाधि मांयलीन हुयगी। हताश बामण ने सरदार गिरधर गोपाल री मूरत साथे पाछा फरिया। महाराण उण मूरत ने जनानी ड्योढी मांय पीतांबरजी रे मिंदर मांय पधराई। वा मूरत हालतांई उठै है अर उणरी सेवा-पूजा नियमित रूप सूं चाले।
मीरा रो कृतित्व 
मीरा रे नाम सूं चावी रचनावांने बे भागां मांय विभाजित करीज सके। एक प्रबंधात्मक ने बीजो पदां रो संग्रह। प्रबंधात्मक रचनावां इण मुजब मानीजे।
  1. नरसीजी रो मायरो
  2. सतभामा नूं रूसणा।
  3. रूकमणी मंगल
  4. गीत गोंविद री टीका
  5. सोरठ रा पद
  6. नरसी मेहता नी हुंडी
पुष्ट प्रमाणां रे अभाव मांय ऊपरली सगली रचनावां मीरा रे लेखण सू नीकलयोड़ी रचनावां कोनी।
मीरा रा पदः- 
मीरा खुद तो आपरा पदां रो संकलन कोनी कीनो ने ओईज एक मोटो कारण है के मारा रा पद जुदा जुदा रूपां मांय मिले। ऐड़ोई मानीजे के मीरा री एक सखी दासी ललिता मीरा रे पदां रो संकलन कीनो। पण दुरभागवश वोई आज उपलब्ध कोनी। डाकरो प्रत री भाषा मीरा कालीन कोनी ने इणज सारू आ ललिता सूं संकलित नी हुय सके।
मीरा रा पद कतिरा ? पदा री संख्या री दीठ सूं विद्वान संपादकां मांय मतभदे घणा। श्री हरि नरायणजी पदां री संख्या 500 बताई तो मीरा बृहत पद संग्रह मांय आ संख्या 590 होयगी। इणरी संग्राहिका डॉ. पद्मावती शबनम है। स्वामी आनंद द्वारा संपादित मीरा सुधा सिंधु मांय पदां री संख्या वधती वधती 1312 तांई पहुंची। डाकोर वाली प्रत मांय आ संख्या घटगी। इणरो संपादन श्री पशुराम चतुर्वेदी कीनो। म्हारे मतानुसार पदा री संख्या 300 सूं वत्ती कोनी। पूणे (महाराष्ट्र) री.एक. इंदिराबेन ने तो मीरा रो भाव आवे ने उण मीरा नाम सूं घणा पदां री रचना कीवी है। ए सैंग प्रगट हुओड़ा है। गुजरात मांय ई मीरा नाम री कोई भक्त हुई है। उणरा पद ई सैंग राजस्थान री मूल मीरा रे नाम चढगा।
खरेखर व्हियो कांई है के भक्तिरस सूं तरबोल मीरा रा पद इतरा तो व्यापक हुआ के मीरा नाम सूं प्रक्षिप्तां री संख्या वधती गई। हिंदी प्रदेशां मांय उणारो रूप हिंदी वणगो तो बंगाल मांय बंगाली अर महाराष्ट्र मांय मराठी।
गुरु-ग्रंथ साहब मांय मीरा रो पद :-
मीरा रा पद घणा भक्तां अर संता रे संकलन मांय लियोड़ा है। आपने अचरज तो हुवे ला पण साथे साथ हरख ई के आपणी मीरा रो एक पद (सबद) गुरु-ग्रंथ साहब माय ई वांचवा मिले। गुरुग्रंथ साहब रो पेहलो संकलन गुरु अर्जुनदेव सं. 1660 मांय गुरुद्वार रामसर मे कियो अर भाई गुरुदास इणरी प्रत तैयार कीवी। इण मांय मारू राग मांय मीरा रो एक पद  हो, जिको लारे सूं नी जाणे क्युं हड़ताल सूं भूंसीजीयो गयो। गुरुग्रंथ साहब रो दूजो संपादन भा ी बानो तैयार कीनो। इण मांय कीं पद फेर जोड़िया गया। इण संपादन मांय ई मीरा रो वोईज पह दो। पण नी जाणे क्युं धकला संस्करणा मांय सांप्रदायिक विद्वेष के किणी दूजा कारण सूं मीरा रो वो पद काढ दियो गयो। आ महातऊ वात है अर शोधरो विषय ई पण अबार आंपां इण पछड़ा मांय नी पड़ां। गुरुग्रंथ साहब रे इण दोनू सस्करणां सूं एक बात तो जरूर साबत हुवे के इण पेहला मीरा री कीरत चौमेर फेलिडयोड़ी ही। ज्यूं के दूजा सैंग प्रदेशां मांय हुओ, पंजाब मांय मीरा रे पदांरो पंजाबीकरण हुयगो। देवनागरी में मां लिप्यंतरति रूप ओ पद इण भांत है:- 
सतिगुरु प्रसाद राग मारू वाणी मीराबाई।। 
मन हमारो बांध्यो माई, कंवल नैन अपने गुन रहाओ। 
तीखण तीर बेधि शरीर दूरि गया माई। 
लाग्यो तब जान्यो नाहि, अब ना सहिओ जाई रे माई।।1।। 
तंत्रमंत्र आउखद करऊ तउ पीर ना जाई। 
है कोई उपकार करे कठिन दर्द री माई।।2।। 
निकट हो तुम दूर नहीं बेगि मिलो आई। 
मीरा गिरधर स्वामी दयाल न तन की तनप बुझाई रे माई 
(आदि ग्रंथ पानो सं. 223) (1)
मीरा रे पदां री भाषा 
मीरा रा सैंग पद राजस्थानी मांय है। खरी वात तो आ है के मातभाषा सिवाय किणी दूजी भाषा मांय उण पद रचिया ई कोनी। इण संबंध मांय बंगाली, गुजराती अर मराठी विद्वानां री राय जोवा जोग है। चावा भाषा वैत्रानिक बंगाली विद्वान डॉ. सुनीतिकुमार चटर्जी आपरी पोथी मांय लिखियो के मीराबाई शुद्ध मारवाड़ी मांय आपरे पदां री रचना कीव। शुद्ध राजस्थानी (मारवाड़ी) रा थोडा कवि आपरे भावां रे महत्त्व रे कारण, आखा भारत रा हुयगा, ज्युं के मीराबाई। मीरा रा पद सगला उत्तर भारत मांय इतरा तो लोकप्रिय वणिया के उणरी शुद्ध राजस्थानी (मारवाड़ी) भाषा परिवर्तित हुय। र शुद्ध हिंदी कांनी ढली। राजस्थान रा कवि हिंदी रा गिणीजण लागा। डॉ. तारापुरवाला लिखियो के राजपूताना, गुजरात ने आखो मथुरा प्रदेश (ब्रज प्रदेश) मीराने आपरी माने पण किण काल मांय वे रह्या, उण टैम री इण तीनूं प्रदेशां री भाषा एक ईर्ज ही अर वा ही पुरानी पश्चिमी राजस्थानी। इण वास्ते अचरज  नी के मीरा रा पद इण सघी भाषावां मांय मिले। 

गुजरात रा घणा चावा राजनैतिक नेता अर मोटा साहित्यकार श्री के.एम. मुंशी लिखे के मीरा गुजराती तो नी ही। उणरा पद गुजराती मांय लिखियोड़ा कोनी हा। तोई बात सची लागे के मीरा रे नाम सूं पचलित पद कितरा मीरा रा है, ओ केहवणो कठण है। 

जुदा जुदा प्रदेशां रा तीनू ख्यात नाम भाषा वैज्ञानिक अर साहित्यकार विद्वानां रे कथन सूं अबे ओ स्पष्ट हुवे है के मीरा फगत  आपरी मातभाषा राजस्थानी मांय ईज पदां री रचना कीवी। किणी दूजी भाषां मांय नी। हिंदी, गुजराती के दूजी भाषांवा मांय मीरा रा जिके पद मिले वे सगला के तो रूपांतरित है के प्रक्षिप्त। हिंदीवाला तो ि ण भाषा साथे घणोईज अत्याचार कीनो। राजस्थानी रो कक्को नी जाणणवाला जद मीरा माथे शोध कार्य कर्यो तो कैड़ी कैड़ी भूंडी भलां कीवी उणरा थोड़ा नमूना इण मुजब है।
1. डॉ. राशिप्रभा आपरे शोध प्रबंध मीरा की भाषा मांय लिखियो के खड़ी बोली हिंदी मे तो ने का प्रयोग होता है किंतु मीरा में नहीं हुआ है। संभव है कि छं की मात्रा में आधिक्य न होने देने के लिये मीराने ऐसे स्थलों पर ने छोड़ दिया हो। अबे इण देवीने कुण समझावे के राजस्थानी व्याकरण री प्रकृति ने उणरा नियम जुदा है। वा हिंदी कोनी ? राजस्थानी मायं ओईज ने करम कारक रो चिन्ह हुवे। हिंदीं मांय करता रो चिन्ह ने  हुवे तो राजस्थानी मांय ओईज ने करम कारक रो चिन्ह हुवे। ऐड़ीडेज भूल गुजराती व्याकरण सूं अनभिज्ञ ए विभक्ति ने लेयर हुई है, जिका संज्ञा तथा सर्वनाम रे साथे संयुक्त हुयङर उणरो अंग वण जावे। जथा-रामे रोटली खाधी। अथवा माई मेरो मोहने मन हरयो इण संबंध मांय डॉ. शशिप्रभा लिखियो के कदाच मात्रा री दीठ सूं मोहन री जग्या मोहने कर दिनो है। दूजी भाषावां नी ने जाणता थकां उण मांय आपरो धणियाप जणावणो कितरो दोरो है, इण उदाहरणां सूं ठाह पड़े।
2. मीरा रे पदां रो संपादन घणा विद्वानां कीनो है। इण मांय राजस्थान अर राजस्थान बारे रा सगला विद्वान सामेल है। संत साहित्यरा घणा मानीता विद्वान आचार्य परशुराम चतुर्वेदी ने छोडङर बीजा सगला मीरा रा आज उपलब्ध पदां री भाषा ने आदार मान र उणरो विशलेषण कीनो है। इणरे परिणाम स्वरूप मीरा रे पदां री भाषा माथे खड़ी बोली ब्रज अर गुजराती रो प्रभवा दरसायो गयो है, जके आंपां ऊपर जोल लीधो है के नामी विद्वान इण बात ने खोटी साबित कीवी है। आचार्य चतुर्वेदी डाकोर वाली प्रत ने आधर मारङर मीरा रे पदां रो संपादन कियो। राजस्थानी वर्ण माला रे आखरां री खरी ओलख नी हुवण सूं चतुर्वेदीजी अठै गोत खायगा।
इत प्रत मांय ण कार री प्रचुरता है ने आ साव अप्राकृतिक है। राजस्थानी मांय न अर ण दोनू स्वतंत्र ध्वनियां है। प्राकृत रे ज्यूं इण मांय शब्द रे प्रारंभ मांय ण कदैईनी आवै। हां तत्मस शब्दां मांय मध्य तथा अंत मांय न री जग्या ण जरूर बणे। पण इण कारण उणरे अरथ मांय समूलको परिवर्तन आवे। मन री जग्या मण हुवण सूं अरथ बदलीज जासी। मन रे परस हरि के चरण पद मांय जो आप मन री जग्या मण कर देसो तो इणरो अरथ हुवेला के हे चालीस सेरा रा मण (वजन) थूं हरि रे चरणाने स्पर्श कर। इणीज भांत मोहन संज्ञा री जग्या मोहण करणो अर नाच्यो री जग्या णाच्यो तथा नंद री जग्या णंद करणे विकृत भाषा रा प्रयोग है। वैदिक ल ध्वनि हिंदी मांय कोनी। जद के राजस्थानी, गुजराती अर मराठी मांय इण ध्वनि रो आगवो महत्त्व है। इणरे प्रयोग सूं अरथ बदल जावे। हिंदी मांय गोली रो प्रयोग बंदूक सूं छूटणवाली गोली के दवा री गोली सूं ई हुवे अर दासी रे अरथ मांय ई। जद के राजस्थानी मांय दोनूं रा अरथ जुदा जुदा। इणीज भांत श्री परशुराम चतुर्वेदी री संपादित प्रत मांय व्याकरण री भूलांई निरी है।
तत्कालीन काव्य भाषावां डींगल अर पिंगल ने आपरी रचनावां रो आधार नी  बणायङर जांभोजी के जसनाथजी ज्यु मीरा लोकभाषाने अपणाई।  खरेखर तो मीरा रे पद री भाषा रो रूप निरधारण करण सारू उणरा पूर्ववर्ती अर परवर्ती कवियांरी भाषा निजर आगे राखणी पड़सी। आपणे सोभाग सूं उणारा लिखित रूप आंपणने आज उपलब्ध है। तो इण दीठ सूं मीरा रे पदां रो संपादन करण री ताती जरूरत है।
भाषा रे ज्यूं मीरा रो काव्य विधान ई लोकोन्मुखी हो। उणरे पदां मांय गेयता है न्युं डॉ. सत्यनेद्र कह्यो. मीरा रा पद मंत्र है। रागांने देखा तो मीरा रा पद छाईस जुदी जुदी रागां मांय गावीजण रो स्पष्ट उलेल्ख है। मालकोश, सोरठ, भैरवी, मांड. डोडी, मारू देस, पीलू, महीर, खमाच ने प्रभाती इणमांय मुख्य है।
अलंकारां कांनी निजर करां तो लागे के अलंकारां सारू मीरा ने कोई प्रयास करण री जरूरत कोनी पड़ी। एतो भावावेश सूं आपोआप आयने योग्य स्थान ग्रहण कर लेता। केशव रे ज्युं उणाने ठूंसण री आवश्यकता कोनी ही। उपमा, उत्पेक्षा, रूपक, अनुप्रास अतिशयोक्ति आद अलंकार प्रचुर मात्रामांय मीरा रे काव्य मांय मिले. उणरा जिके उपमान है वे राजस्थान रे लोक ने प्रतिबिम्बित करे। उणरा पद इतरा तो सहज अर सरल के वे जन-मानस रा हार बणगा। तुलसी ज्यूं मीरा रे काव्य मांय भलांई पांडित्य नजरनी आवे, पण सैंग संप्रदायां सूं ऊपर उण मांय सहज भारतीय तत्त्व-चिंतन रा दरसण देखण जोग है।
मीरा रे काव्य मांय छंद वैविध्य ई घणो। दूहा, सोरठा, सवैया रे साथे साथे उण कुंडल, ताटक अरप सरसी छंदां मांय पद रचना कीवी।
मीरा री भक्ति 
श्रद्धा भक्तिरो आधार है ने भक्ति, भक्त अ े भगवान रे भावात्मक संबंधां ने व्यक्त करे। इणीज भावात्मक संबंधां ने नारदजी प्रेमा रूपा अर अमृत स्वरूपा कह्यो है। इणने प्राप्त कर मिनखने कोई आसक्ति नी रहवे। वो पूर्ण तृत्प हुजावे। उणरे मन मांय किणी रे प्रति द्वेष रो लेशमात्र अंश ई नी रहवे। वो आत्मराम वण जावे। उणने तो भगवान ने छोडङर किणी दूजे आश्रय री जरूरत रहवे ई कोनी. इण ने ईज अनन्यता कहवे।
मीरा री भक्ति प्रेम रूपा ही। उणमांय अन्यनता है। भगवानने छोड़ङर उणने भाई, सगा, संबंधि किणी रे आश्रय री जरूरत कोनी. मात्र भगवान ईज परम आश्रय है ने इणीज वास्ते उम गायो के 
म्हारा तो गिरध गोपल दूसरा ना कोई। 
दूसरा ना कोई साधां सकल लोक जोई। 
भाई छोड्यां बंधु छोड्या छोड्या सगा मोई। 
भक्त देख राजी हुई, जगत देख रोई। 
दध  मथ घृत काझ लिया दार दिया छुंया। 
माई म्हूं तो सांवले रंग राची। 
गाया गाया हरि निस दिन काल-व्याल री वांची। 
मीरा सिरी गिरधर नागर, प्रेम रसीली जांची।
इण परम प्रेम भक्ति री इगियारे आसक्तियां मानी है। ने एक वात्सल्यने छोड़ इण सगली आसक्तियां रा दरसण मीरा रे पदां मांय दीठीजे (1) गुण कथन (2) रूपासक्ति (3) पूजासक्ति (4) स्मरणासक्ति (5) दास्यासक्ति (6) सख्यासक्ति (7) कांतासक्ति (8) वात्साल्यासक्ति (9) आत्मनिवेदनासक्ति (10) विरहासक्ति अर (11) तन्मयदासक्ति।
श्रीमद् भागवत मांय जिण जिण नवधा भक्ति रो उल्लेख है उण मांय अर नारदजी री उपर्युक्त आसक्तियां मांय तत्वतः कोई फरक कोनी।
मीरा मांय कांतासक्ति री प्रचुरता है। इणने मधुरासक्ति ई कहवे। ठौड़ ठौड़ प्रियतम, स्वामी, भव भव रा भरतार, जनम जनम रो साथी, प्रीतम, साजन, पिया आदर जिका संबोधन भगवान वास्ते मिले वे दांपत्यभाव रा सूचक है जिणमाय समर्पण, प्रेम, विहर सेवा अर मिलण री तीव्रता है। भूल सूं ईज जो कोई उण पदां मांय सांसारिकता रा दरसण करणो च्हावे तो उणने घोर निराशा ईज मिलेला। आपां जांणा हो के प्राणीमात्रा मांय रतिभाव घणो प्रबल हुवे। इणरी प्रभलता मिनख रो विनाश है। गीता रे अध्याय दोय मांय भगवान एक पछे एक इण विनाश रा कारण दरसावतां कह्यो है के :-
ध्यायतो विषयान्युंसः रागस्तेषूपजयाते। 
संगात्संजायते कामः कामात्क्रोधोअभिजायते।।62।। 
क्रोधाभ्दवति संमोहः संमोहात्वस्मृति विभ्रम। 
स्मृतिभ्रंशात् बुद्धिनाशो, बुद्धिनाशात्प्रणश्यति ।।63।।
(विषयां रा चिंतन करणवाला पुरूष री उण विषयां मांय आसक्ति हुये जावे। आसक्ति सू  उण विषयां री कामना उत्पन्न हुवे अर कामना मांय विघ्र पड़ण सूं क्रोध उत्पन्न हुवे। क्रोध सूं संमोह (अविवेक) उत्पन्न हुवे अर संमोह सूं स्मरण सख्ति भ्रमित हुवे। स्मरण शक्ति रे भ्रमति हुवण सूं बुद्धि रो विनाश हुवे अर बुद्धि रे नाश सूं आपरे श्रये साधन सूं चलित हुय जावे।
पण लौलिक विषय वासनावां ने भगवान मांय लीन करणो ईज मिनख। जीवण रो चरम लक्ष्य हुवणो चाहीजे। मीरा इण काम मांय सौ टका सफल हुई। पण लोग मीरा रे इण उच्च दांपत्यभाव ने नी समझ सकिया अर  ुणने मदनबावली कहङर प्राणआतंक कष्ट दीनो तो ई वा विस्वास सूं डिगी नी।
मीरा तो आपरे इष्ट गिरधर गोपाल री जनम जनम री दासी ही अर गिरधर उणरा जनम जनम रा भरतार। वा तो कादा मांय कमल ज्यूं आपरी सुवास करती रही। उण झुकणो तो जाणियो ई कोनी हो। वा आछी तरयां जाणती ही के संसार मांय मिनखरो नाम उणरे सुकार्यां सूं होवे नी के धन, धाम, संतान अर वरण-वर्ग सूं। इणीज वास्ते एक लोक दूहो आज ई राजस्थान रे लोगां के कंठ रो हार वणियोड़ो है। 
नाम रहेगो काम सूं सुणो स्याणा लोग। 
मीरा सुत जायो नहीं शिष्य न मुंड्यो कोय।। 
उणरा भींतड़ा नी पण गीतडा अमर हुयगा अर आज चारसो वरसां पछे पण जागरमआं भक्त मंडिलायां अर साहित्यिक संगोष्ढियां मांय मीरा रो श्रद्धा युक्त स्मरण मीराने अमर वणा दियो।