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ऐतिहासिक स्थल

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एतिहासिक स्थल

बूंदी रो किलो (तारागढ)
इतिहास
मेवाड रा राणा लाखा कसम खाई की अमुक तिथी तक अगर बे इ किले ने ना जितेगा तो बे अन्न जल नही ग्रहण करेगा। पण जद किलो हासिल ना हुयो तो बे मिट्टी रो किलो बणवार बिने जीतणे री कोशिश करी इयारी सेना मे सामिल एक हाडा लडाके ने इ दुर्ग री रक्षा रो प्रयास करियो। ओ छदम युद्ध वास्तविक युद्ध मे बदल गियो औंर लडाके री मोत हुयगी। महमुद खिलजी औंर राणा कुम्भा भी क ई बार बूंदी ने जीत लिया। जयपुर नरेश सवाई जय सिंह इण पर आक्रमण कर बहनोई बुद्ध सिंह हाडा ने हटा र दलेल सिंह ने अधिपति बणायो ।
ओ किलो आप रे जीवन्त भित्ति चित्रो रे वास्ते भी जाणो जावे हैं। खासकर राव उम्मेदसिंह रे समय बणियोडी चित्रशाला बूंदी चित्र शैंली रो उत्कृष्ट उदाहरण हैं।

बनावट
अरावली पर्वत श्रंृखला मे स्थित ओ किलो हाडा राजपूतो री वीरता रो प्रतीक हैं। बम्बादेव रा हाडा शासक देव सिंह बूंदी रा मुखिया जैंतामीणा ने हरा र बूंदी ने जीत लिया, बाद मे इया रा वंशज राव बर सिंह ई दुर्ग रो निर्माण करवायो।करीब 1,426 फ़ीट ऊंची पर्वत री चोटी पर स्थित होणे कारण ई किले ने तारागढ नाम भी देईजो।कर्नल टाड इ किले री स्थापत्य कला सु प्रभावित हो इने राजस्थान रो सर्वश्रेष्ठ किलो बतायो। तारागढ पर हाडा वंश रा राजा कदी भी एक छत्र राज ना कर सकिया । आपरी सामरिक स्थिती रे कारण ओ किलो आक्रान्ताओ री लिप्सा रो कारण रहयो।
जैंसलमेर दुर्गÔ
जैंसलमेर दुर्ग भारत री उत्तरी सीमा रे प्रहरी रे रूप मे खडो हैं। हैं।ओ दुर्ग भाटी राजपूतो री वीर भूमि रे रूप मे प्रसिद्ध हैं इण वास्ते ओ दोहो प्रचलित हैं।
गढ दिल्ली,गढ आगरो,अधगढ बीकानेर।
भलो चिणायो भाटियां,सिरैं तो जैंसलमेर।।
इतिहास
सर्वप्रथम अलाउद्दीन खिलजी किले पर आक्रमण कर 8 साल तक डेरो डालियो।फ़िरोजशाह तुगलक रे समय दुसरो युद्ध हुयो जिण मे कई भाटी सरदार शहीद हुया औंर वीरांगनाया जौहर करियो।तीसरे युद्ध मे भाटी राजपूत वीर गति पाई पण रानियां जौहर कोनी करियो।ओ युद्ध शरणागत अमीर अली द्वारा रावल लूणकरण रे साथे धोखाधडी रे कारण हुयो।
बनावट
इ दुर्ग ने रावल जैसल 1115 ई. मे बणवायो।ओ किलो 7 साल मे पूरो हुयो।जैंसलमेर दुर्ग त्रिकुटाकृ ति रो हैं जिण मे 99 बुर्जा हैं। इ दुर्ग ने पीले रंग रे पत्थरो पर पत्थरो ने राख र विशेष मसाले सु जोड र बणायो गियो हैं।पीले रंग रे पत्थरो रे उपयोग रे कारण धूप मे ओ किलो सोने रे समान चमके, जिका सु इने सोनगढ भी केविजे हैं।ओ दुर्ग 250 फ़ीट ऊंचो हैं जिण मे दोहरा परकोटा हैं।इण मे प्रवेश द्वार अक्षय पोल हैं जिके रे साथे सूरज पोल,गणेश पोल,औंर हवा पोल भी हैं।इण रो रंग महल औंर मोती महल जालियो झरोखो औंर आर्कषक चित्रकारी रे कारण दर्शनीय हैं। जैंसलमेर दुर्ग मे जैंन मंदिर ,बादल महल ,गज विलास,जवाहर विलास महल ,पार्शवनाथ मंदिर ,लक्ष्मी नारायण मंदिरऔंर ऋ षभदेव मंदिर भी वणियोडा हैं। किले मे ह्स्त लिखित ग्रन्थो रो सबसु बडो भंडार हैं।
जयगढ दुर्ग
इतिहास
मिर्जा जयसिंह द्वारा इण दुर्ग रो निर्माण हुयो हो। विशिष्ट केदीयो री जेल रे  रूप मे इ दुर्ग रो उपयोग हुवतो हो। सवाई जय सिंह आप रे छोटे भाई विजय सिंह ने अठे ही केद करियो हो औंर अठे ही विणरी मृत्यु होइ।अठे बाट औंर तराजू भी मिले हैं, जिका शायद बारूद तोलने रे काम आवता हा। इ गढ रो उपयोग धन ने सुरक्षित राखण वास्ते करिजे हो।मान्यता हैं कि काबूल,कंधार ने जीतणे बाद लायोडो धन अठे ही राखियोडो हो। 
पूरे भारत मे ओ ही एक दुर्ग हो जिके मे तोप ढालने रो कारखानो हो।जय बाण तोप एशिया री सब सु बडी तोप हैं। इण तोप मे एक बार मे 100 किलो बारुद भरिजे हैं।तोप रो वजन 50 ट्न हैं। परीक्षण रे तौंर सु इने एक बार ही चलायो गयो ।

बनावट
इण दुर्ग रो विस्तार करीब 4 किमी री परिधि मे हैं।इण रा मुख्य दरवाजा डूृंगर ,दरवाजा ,अविन दरवाजा ,औंर भैंरु दरवाजा हैं। इण मे डूंगर नाहर गढ री ओर अवनि आम्बेर  राज प्रसाद री औंर दुर्ग दरवाजा साग़र जलाशय री ओर निकले हैं।दुर्ग मे सुरंग भी हैं।अठे जलेब चौंक ,खिलवत निवास,ललित मन्दिर,विलास मन्दिर,सूर्य मन्दिर,राणावत जी रो चौंक दर्शनीय हैं।अठे रे लक्ष्मी औंर विलास मन्दिर री जालियो मे बारीक कारीगरी करियोडी हैं।अठे काल भैंरव मन्दिर हैं।मनोरंजन वासते कठ पुतली उधान भी हैं।जय गढ रे भीतर एक अन्तःदुर्ग भी हैं।जिकेमे शास्त्रो रो विशाल सग्रंह हैं। जय बाण रे अलावा अठे ओर भी 9 तोपा राखियोडी हैं।ईण रे अलावा कई तरह री तलवारा,लम्बी राइफ़ला,बन्दूका,भाला,शाही नगाडा,घडा,विशाल कलश,आदि चीजा देखण वालो रो मन मोह लेवे हैं।
नागौंर दुर्ग
मारवाड रा दूसरा दुर्ग पहाडा ऊपर बणियोडा हैं पण नागौंर दुर्ग जमीन ऊपर बणियोडो हैं। बीच मे स्थित होणे कारण ईण पर निरंतर हमला होवता हा। नागौंर ने जांगल जनपद री राजधानी मानिजे हो। अठे नागवंशिय क्षत्रिय दो हजार साल तक शासन करियो। इरे निर्माण री एक विशे षता हैं कि बार सु छोडोडा तोप रा गोला प्राचीर ने पार कर किले रे महल ने कोई नुकसाण नहीं पहुँचा सके।जबकि महल प्राचीर सु ऊपर उठयोडो हैं।
बनावट
नागौंर दुर्ग वास्तुशास्त्र रे नियमो रे मुताबिक वणियोडो हैं। इणरे चारो औंर गहरी खाई खोदीयोडी हैं। इणरो परकोटो 5 हजार फ़ीट लम्बो हैं। इण प्राचीर मे 28 बुर्जा औंर दोहरा परकोटा हैं।ओ दुर्ग चारो औंर सु रेत रे धोरो सु घिरयोडो हैं। नागौंर दुर्ग रो मुख्य द्वार बडो भव्य हैं। इ द्वार पर विशाल लोहे री सींंखचो वालो फ़ाट्क लागियोडो हैं।दरवाजो रे दोनो ओर विशाल बुर्ज औंर धनुषाकार भाग ऊपर 3 द्वार वालो झरोखा वणियोडा हैं।अठे सु आगे किले रो दूसरो विशाल दरवाजो हैं। बिरे बाद 60 डिग्री रो कोण बणतो तीसरो विशाल दरवाजो हैं। इ दो दरवाजो रे बीच रे भाग ने धूधस केविजे हैं।किले रो परकोटो दोहरो वणियोडो हैं।तीसरे परकोटो ने पार करने पर किले रो अन्तःभाग आ जावे हैं। किले रे 6 दरवाजा हैं । जिका सिराइ पोल , कचहरी पोल, सूरज पोल,घूषी पोल औंर राज पोल रे नाम सु जाणा जावे हैं। किले रे दक्षिण भाग मे एक मस्जिद हैं। इ मस्जिद ने शाँहजहा बणवाया था।
इतिहास
केन्द्रीय स्थल पर होणे कारण ई दुर्ग ने बार बार मुगलो रे आक्रमण रो शिकार होणो पडियो । महाराणा कुंभा भी दो बार नागौंर पर आक्रमण करियो। जिकामे बे सफ़ल हुया ।मारवाड रा शासक बख्त सिंह रे समय इ दुर्ग रो पुर्ननिर्माण करवायो गयो । ए किले री सुरक्षा व्यवस्था ने मजबूत करिया। मराठा भी इ दुर्ग ऊपर आक्रमण करियो। महाराणा विजय सिंह ने भी मराठो रे हमलो सु बचणे वास्ते कई महीनो तक दुर्ग मे रेवणो पडियो।ओ दुर्ग पांचाल नरेश द्रुपद रे आधिपत्य मे हो जिके ने अर्जुन जीतणे बाद द्रोणाचार्य ने सौंंप दियो हो।


प्रसिद्ध छतरीस्थान
8 खंभा री छतरीबाडोली
32 खंभा री छतरीरणथम्भौर
80 खंभा री छतरीअलवर
क्षारबाग री छतरियाँँकोटा अर बूंदी
बडा बाग री छतरीजैसलमेर
राव बीकाजी अर रायसिंह री छतरियाँँदेवकुंड (बीकानेर)
राठौड राजाओं री छतरियाँँमंडोर (जोधपुर)
राजा बख्तावर सिंह री छतरीअलवर
कछवाहा शासका री छतरियाँँगटोर (नाहरगढ, जयपुर)
राजा जोधसिंह री छतरीबदनौर
सिसोदिया वंश रे राजाओ री छतरियाँँआहड (उदयपुर)
रैदास री छतरियाँँचित्तौडगढ़
गोपालसिंह री छतरीकरौली
मानसिंह प्रथम री छतरीआमेर

जैसलमेर - पटवा री हवेली, सालिम सिंह जी री हवेली, नथमल जी री हवेली।

बीकानेर - बछावता री हवेली।

जोधपुर - बडे मिया री हवेली, पोकरण री हवेली, पाल हवेली, राखी हवेली।

टोंक - सुनहरी हवेली।

कोटा - बडे देवता री हवेली।

उदयपुर - बागोर हवेली।

झुंझुनूं - टीबडेवाला री हवेली, ईसरदास मोदी री हवेली।

नवलगढ - शेखावटी री स्वर्ण नगरी, पौद्दार हवेली, भगेरिया री हवेलियाँ, भगता री हवेली।

बिसाऊ(झुंझुनूं)- नाथूराम पोद्दार री हवेली, सेठ हीराराम-बनारसी लाल री हवेली, सेठ जयदयाल केडिया री पुराणी हवेली, सीताराम सिगतिया री हवेली।

मण्डावा(झुंझुनूं)- सागरमल लाडिया, रामदेव चौखाणी, रामनाथ गोयनका री हवेलियाँ।

महनसर(झुंझुनूं)- सोने चाँदी री हवेली।

श्रीमाधोपुर(सीकर)- पंसारी री हवेली।

लक्ष्मणगढ(सीकर)- केडिया री हवेली, राठी री हवेली।

चुरू - सुराणों रा हवामहल, रामविलास गोयनका री हवेली, मंत्रियां री मोटी हवेली।

स्वतंत्रता संग्राम

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स्वतंत्रता संग्राम

राजस्थान रे इलाका मांय 19वीं शताब्दी में ईस्ट इण्डिया कम्पनी रो राजनीतिक प्रभुत्व होणे रे कारण युद्ध अर अशान्ति रो वातावरण तो खतम हो चुक्यो हो, पण अटे रे लोगा ने इण वास्ते भारी कीमत चुकाणी पडी ही। राजस्थान री आन्तरिक अर विदेश नीति पर अंग्रेजा रो पूरो अधिकार हुयग्यो हो अर राजा लोग इयारे हाथ री कठपुतली बण गिया हा। ऐडी स्थिति मांय राजस्थान री जनता में भारत रे दूजा प्रान्ता अर राज्या रे समान विद्रोह री ज्वाला सुलगण लागी, अर 1857 रे पेले स्वाधीनता संग्राम में राजस्थान भी विद्रोह री ज्वाला सु अछूतो नीं रह्यो।
राजस्थान मांय 1857 रो स्वाधीनता संग्राम
नसीराबाद
सबसु पेला नसीराबाद में इण विद्रोह री शुरू आत हुई। इणरे पीछे मुख्य कारण यो हो कि ब्रिटिश सरकार अजमेर री 15वीं बंग़ाल इन्फ़ेन्ट्री ने नसीराबाद भेज दियो क्युकि सरकार ने इण पर विश्‍वास नीं हो। सरकार रे इण निर्णय सु सब सैनिक नाराज हुयग्या अर बे ब्रिटिश सरकार के खिलाफ़ क्रांति रो आगाज कर दियो। इणरे अलावा ब्रिटिश सरकार बम्बई रे सैनिका ने नसीराबाद में बुलवाया अर पूरी सेना री जंाच पड़ताल करणे वास्ते कह्यो। ब्रिटिश सरकार नसीराबाद में कई तोपा तैयार करवाई। इणसु भी नसीराबाद रा सैनिक नाराज हुयग्या अर बे विद्रोह कर दियो। सेनाकई ब्रितानिया ने मौत रे घाट उतार दियो अर साथे साथे वियारी सम्पत्ति भी नष्ट कर दी। इण सैनिकां रे साथे दूजा लोग भी शामल हुयग्या।
नीमच
नसीराबाद री घटना री खबर मिलते ही 3 जून 1857 ने नीमच रा विद्रोही कई ब्रितानिया नेे मौत रे घाट उतार दियो फ़लस्वरू प ब्रितानी भी बदलो लेणेे री योजना बणाई। बे 7 जून ने नीमच पर आपरो अधिकार कर लियो। बाद में विद्रोही राजस्थान रे दूसरे इलाका री तरफ़ बढ़ने लाग्या।
जोधपुर
अटे रा कई लोग राजा तख्त सिंह रे शासन सु नाराज हा। जिके कारण एक दिन अटे रा सैनिक इयारे खिलाफ़ विद्रोह कर दियो। इयारे साथे आउवा रा ब्रिटिश विरोधी कुशाल सिंह भी हा।
कुशाल सिंह रो सामनो करणे रे वास्ते लेफ़्टिनेंट हीथकोट रे साथे जोधपुर री सेना आई ही पण कुशाल सिंह इने परास्त कर दियो। बाद में ब्रितानी सेना आउवा रे किले पर आक्रमण करियो पण इने भी हार रो मुँह देखणो पडीयो लेकिन ब्रिगेडियर होम्स इ पराजय रो बदळो लेणो चावतो हो इण वास्ते बोे आउवा पर आक्रमण करियो अबे कुशाल सिंह किले ने छोड़ दियो अर सलुम्बर चला गिया। कुछ दिना बाद ब्रितानी आउवा पर अधिकार कर लियो अर अटे आतंक फ़ैलायो।
मेवाड़
मेवाड़ रा सामंत ब्रितानिया अर महाराणा सु नराज हा। इण सामन्ता में आपसी फ़ूट भी ही। महाराणा मेवाड़ रे सामन्ता ने ब्रितानिया री सहायता करणे री आज्ञा दी। इण टेम सलुम्बर रे रावत केसरी सिंह उदयपुर रे महाराणा ने चेतावनी दी कि यदि आठ दिन में बियारे परम्पराग़त अधिकार ने स्वीकार नीं करियो गयो तो बे बियारे प्रतिद्वंदी ने मेवाड़ रो शासक बणा देवेग़ा। सलुम्बर रे रावत केसरी सिंह आउवा रे ठाकुर कुशाल सिंह ने आपरे अटे शरण दी। इणी समय तांत्या टोपे राजपूताने री ओर कूच करियो। 1859 में नरवर रे मान सिंह इयारे साथे धोखो करियो अर इयाने गिरफ़्तार कर लियो। यद्यपि सामंत प्रत्यक्ष रू प सु ब्रिटिश सरकार रो विद्रोह नीं करियो पण विद्रोहिया ने शरण देर'र इण क्रांति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
कोटा
ब्रिटिश अधिकारी मेजर बर्टन कोटा रे महाराजा ने बतायो कि अटे रे दो चार ब्रिटिश विरोधी अधिकारिया ने ब्रिटिश सरकार ने सौंप देणो चाहिये। पण महाराजाइण काम में असमर्थता जताई तो ब्रितानी इण महाराजा पर आरोप लगायो कि बे विद्रोहिया सु मिलयोडा हैं। इण बात री खबर मिलते ही सैनिक मेजर बर्टन ने मार डालियो। विद्रोही राजा रे महल ने घेर लिया, तब राजा करौली रे शासक सु सैनिक सहायता मांगी। करौली रा शासकसहयोग करियो अर विद्रोहिया ने महल रे पीछे खदेडीया। इणी समय जनरल एच.जी.राबर्टस आपरी सेना रे साथे चम्बल नदी रे किनारे पहुंच्या। इयाने देख'र विद्रोही कोटा सु भाग गिया।
राज्य रे दूजा क्षेत्रा में विद्रोह
इण विद्रोह में अलवर रे कई नेता हिस्सो लिदो। जयपुर में उस्मान खां अर सादुल्ला खांविद्रोह कर दियो। टोंक में सैनिकाविद्रोह कर दीयो अर नीमच विद्रोहिया ने टोंक आणे रो निमंत्रण दियो। ए टोंक रे नवाब रे घेरो डाल'र बियासु बकाया वेतन वसूल करियो। इणी तरह बीकानेर रा शासक नाना साहब ने सहायता रो आश्‍वासन दियो हो अर तांत्या टोपे जी री मदद रे वास्ते द्स हजार घुड़सवार सैनिक भेजिया। हालांकि राजस्थान रा अधिकांश शासक पूरे विद्रोह काल में ब्रितानिया रे प्रति वफ़ादार रहिया, फेर भी विद्रोहिया रे दबाव रे कारण बियाने यत्र-तत्र विद्रोहिया रोे समर्थन प्रदान करणो पडीयो।
राजस्थान में विद्रोह रो घटनाक्रम
विद्रोह रो स्थानविद्रोहरीतारीख
नसीराबाद28 मई 1857
नीमच3 जून 1857
एरिनपुरा21 अगस्त 1857
आउवाअगस्त 1857
देवली छावनीजून 1857
भरतपुर31 मई 1857
अलवर11 जूलाई 1857
धौलपुरअक्टूबर 1857
टोंकजून 1857
कोटा15 अक्टूबर 1857
अजमेर री केंद्रीय जेल9 अगस्त 1857
जोधपुर लीजियन8 सितम्बर 1857


क्र.स.स्वतंत्रतासेनानीगांव / क्षेत्रजिलो
1श्री अर्जुन लाल सेठी-जयपुर
2श्री केसरी सिंह बारहठ-उदयपुर
3श्री जमना लाल बजाज-सीकर
4श्री लादू राम जोशीमूंडवाड़ासीकर
5श्री नेतराम सिंहग़ोरीरझुन्झुनंू
6सरदार श्री हरपाल सिंहह्नुमान पुराझुन्झुनंू
7श्री घासीराम चोधरीबासडीझुन्झुनंू
8श्री हीरालाल शास्त्रीजोबनेरजयपुर
9बाबा श्री हरीशचन्द्र शास्त्री-जयपुर
10श्री राम नारायण चौधरीनीम का थाना-
11श्री नरोतम लाल जोशी-झुन्झुनूं
12श्रीमती दुर्गा देवीचेचेरीझुन्झुनूं
13श्री मोती लाल तेजावतझाड़ोलउदयपुर
14श्री जोरावर सिंह बारहठशाहपुराउदयपुर
15श्री प्रतापसिंह बारहठ-उदयपुर
16श्री मोहन लाल सुखाड़ियानाथद्वारा-
17श्री माणिक्य लाल वर्माबिजोलियाभीलवाड़ा
18श्री साधु सीताराम दासबिजोलियाभीलवाड़ा
19श्री बलवन्त सिंह मेहता-उदयपुर
20श्री दामोदर दास राठीपोकरण-
21श्री साग़रमल गोपा-जैसलमेर
22श्री छग़न राज चोपासनीवाला-जोधपुर
23श्री जयनारायण व्यास-जोधपुर
24श्री बालमुकुन्द बिस्सा-जोधपुर
25श्री मथुरादास माथुर-जोधपुर
26श्री नृसिंह कछवाहा-जोधपुर
27श्री ताड़केश्वर शर्मापंचेरीझुन्झुनूं
28श्री नानाभाई खाँट-डूँग़रपुर
29सुश्री कालीबाई भीलरास्तापालडूँग़रपुर
30श्री गोकुललाल असावादेवली
31श्री भोग़ीलाल पाण्डया-डूँग़रपुर
32श्री ऋषिद्त मेह्ताब्यावर-
33श्री ज्वाला प्रसाद शर्मा-अजमेर
34श्री गोपाल सिंहखरवाअजमेर
35श्री गोकुलभाई भट्टहाथलसिरोही
36श्री मास्टर आदित्येन्द्रथूननगरभरतपुर
37श्री रमेश स्वामीभुसावरभरतपुर
38श्री गोकुल वर्मा-भरतपुर
39श्री हरिदेव जोशीखान्दूबाँसवाड़ा
40श्रीमती नगेन्द्रवाला-कोटा
41पं श्री अभिन्न हरि-कोटा
42श्री विजय सिंह पथिकबुलन्दशहर-
43श्री हरिभाऊ उपाध्यायभौंरासाग्वालियर
44श्री नानक भील-बूँदी
45श्री बीरबल सिंहरायसिंह नगर-
46मास्टर श्री भोलानाथ-अलवर
47श्री जुगलकिशोर चतुर्वेदीसौंख (मथुरा)-
48श्री शोभाराम-अलवर
49श्री स्वामी कुमार नन्दरंगून (म्याम्यार)-
50बाबा श्री नरसिंहदासमद्रास-
51श्री देवी शंकर तिवाड़ीलखनऊ-

किला

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राजस्थान रा किला
क्र.स.किले रो नांवस्थान
1बूंदी रो किलो (तारागढ)बूंदी
2जैसलमेर रो किलोजैसलमेर
3जयगढ रो किलोजयगढ
4नागौर रो किलोनागौर


इतिहास 
मेवाड रा राणा लाखा कसम खाई की अमुक तिथी तक अगर बे इ किले ने ना जितेगा तो बे अन्न जल नही ग्रहण करेगा। पण जद किलो हासिल ना हुयो तो बे मिट्टी रो किलो बणवार बिने जीतणे री कोशिश करी इयारी सेना मे सामिल एक हाडा लडाके ने इ दुर्ग री रक्षा रो प्रयास करियो। ओ छदम युद्ध वास्तविक युद्ध मे बदल गियो औंर लडाके री मोत हुयगी। महमुद खिलजी औंर राणा कुम्भा भी क ई बार बूंदी ने जीत लिया। जयपुर नरेश सवाई जय सिंह इण पर आक्रमण कर बहनोई बुद्ध सिंह हाडा ने हटा र दलेल सिंह ने अधिपति बणायो ।
ओ किलो आप रे जीवन्त भित्ति चित्रो रे वास्ते भी जाणो जावे हैं। खासकर राव उम्मेदसिंह रे समय बणियोडी चित्रशाला बूंदी चित्र शैंली रो उत्कृष्ट उदाहरण हैं।

बनावट 
अरावली पर्वत श्रंृखला मे स्थित ओ किलो हाडा राजपूतो री वीरता रो प्रतीक हैं। बम्बादेव रा हाडा शासक देव सिंह बूंदी रा मुखिया जैंतामीणा ने हरा र बूंदी ने जीत लिया, बाद मे इया रा वंशज राव बर सिंह ई दुर्ग रो निर्माण करवायो।करीब 1,426 फ़ीट ऊंची पर्वत री चोटी पर स्थित होणे कारण ई किले ने तारागढ नाम भी देईजो।कर्नल टाड इ किले री स्थापत्य कला सु प्रभावित हो इने राजस्थान रो सर्वश्रेष्ठ किलो बतायो। तारागढ पर हाडा वंश रा राजा कदी भी एक छत्र राज ना कर सकिया । आपरी सामरिक स्थिती रे कारण ओ किलो आक्रान्ताओ री लिप्सा रो कारण रहयो।



जैंसलमेर दुर्ग भारत री उत्तरी सीमा रे प्रहरी रे रूप मे खडो हैं। हैं।ओ दुर्ग भाटी राजपूतो री वीर भूमि रे रूप मे प्रसिद्ध हैं इण वास्ते ओ दोहो प्रचलित हैं।
गढ दिल्ली,गढ आगरो,अधगढ बीकानेर।
भलो चिणायो भाटियां,सिरैं तो जैंसलमेर।।

इतिहास 
सर्वप्रथम अलाउद्दीन खिलजी किले पर आक्रमण कर 8 साल तक डेरो डालियो।फ़िरोजशाह तुगलक रे समय दुसरो युद्ध हुयो जिण मे कई भाटी सरदार शहीद हुया औंर वीरांगनाया जौहर करियो।तीसरे युद्ध मे भाटी राजपूत वीर गति पाई पण रानियां जौहर कोनी करियो।ओ युद्ध शरणागत अमीर अली द्वारा रावल लूणकरण रे साथे धोखाधडी रे कारण हुयो।

बनावट
 दुर्ग ने रावल जैसल 1115 ई. मे बणवायो।ओ किलो 7 साल मे पूरो हुयो।जैंसलमेर दुर्ग त्रिकुटाकृ ति रो हैं जिण मे 99 बुर्जा हैं। इ दुर्ग ने पीले रंग रे पत्थरो पर पत्थरो ने राख र विशेष मसाले सु जोड र बणायो गियो हैं।पीले रंग रे पत्थरो रे उपयोग रे कारण धूप मे ओ किलो सोने रे समान चमके, जिका सु इने सोनगढ भी केविजे हैं।ओ दुर्ग 250 फ़ीट ऊंचो हैं जिण मे दोहरा परकोटा हैं।इण मे प्रवेश द्वार अक्षय पोल हैं जिके रे साथे सूरज पोल,गणेश पोल,औंर हवा पोल भी हैं।इण रो रंग महल औंर मोती महल जालियो झरोखो औंर आर्कषक चित्रकारी रे कारण दर्शनीय हैं। जैंसलमेर दुर्ग मे जैंन मंदिर ,बादल महल ,गज विलास,जवाहर विलास महल ,पार्शवनाथ मंदिर ,लक्ष्मी नारायण मंदिरऔंर ऋ षभदेव मंदिर भी वणियोडा हैं। किले मे ह्स्त लिखित ग्रन्थो रो सबसु बडो भंडार हैं।


इतिहास
मिर्जा जयसिंह द्वारा इण दुर्ग रो निर्माण हुयो हो। विशिष्ट केदीयो री जेल रे  रूप मे इ दुर्ग रो उपयोग हुवतो हो। सवाई जय सिंह आप रे छोटे भाई विजय सिंह ने अठे ही केद करियो हो औंर अठे ही विणरी मृत्यु होइ।अठे बाट औंर तराजू भी मिले हैं, जिका शायद बारूद तोलने रे काम आवता हा। इ गढ रो उपयोग धन ने सुरक्षित राखण वास्ते करिजे हो।मान्यता हैं कि काबूल,कंधार ने जीतणे बाद लायोडो धन अठे ही राखियोडो हो। 
पूरे भारत मे ओ ही एक दुर्ग हो जिके मे तोप ढालने रो कारखानो हो।जय बाण तोप एशिया री सब सु बडी तोप हैं। इण तोप मे एक बार मे 100 किलो बारुद भरिजे हैं।तोप रो वजन 50 ट्न हैं। परीक्षण रे तौंर सु इने एक बार ही चलायो गयो ।

बनावट
इण दुर्ग रो विस्तार करीब 4 किमी री परिधि मे हैं।इण रा मुख्य दरवाजा डूृंगर ,दरवाजा ,अविन दरवाजा ,औंर भैंरु दरवाजा हैं। इण मे डूंगर नाहर गढ री ओर अवनि आम्बेर  राज प्रसाद री औंर दुर्ग दरवाजा साग़र जलाशय री ओर निकले हैं।दुर्ग मे सुरंग भी हैं।अठे जलेब चौंक ,खिलवत निवास,ललित मन्दिर,विलास मन्दिर,सूर्य मन्दिर,राणावत जी रो चौंक दर्शनीय हैं।अठे रे लक्ष्मी औंर विलास मन्दिर री जालियो मे बारीक कारीगरी करियोडी हैं।अठे काल भैंरव मन्दिर हैं।मनोरंजन वासते कठ पुतली उधान भी हैं।जय गढ रे भीतर एक अन्तःदुर्ग भी हैं।जिकेमे शास्त्रो रो विशाल सग्रंह हैं। जय बाण रे अलावा अठे ओर भी 9 तोपा राखियोडी हैं।ईण रे अलावा कई तरह री तलवारा,लम्बी राइफ़ला,बन्दूका,भाला,शाही नगाडा,घडा,विशाल कलश,आदि चीजा देखण वालो रो मन मोह लेवे हैं।



मारवाड रा दूसरा दुर्ग पहाडा ऊपर बणियोडा हैं पण नागौंर दुर्ग जमीन ऊपर बणियोडो हैं। बीच मे स्थित होणे कारण ईण पर निरंतर हमला होवता हा। नागौंर ने जांगल जनपद री राजधानी मानिजे हो। अठे नागवंशिय क्षत्रिय दो हजार साल तक शासन करियो। इरे निर्माण री एक विशे षता हैं कि बार सु छोडोडा तोप रा गोला प्राचीर ने पार कर किले रे महल ने कोई नुकसाण नहीं पहुँचा सके।जबकि महल प्राचीर सु ऊपर उठयोडो हैं।
बनावट
नागौंर दुर्ग वास्तुशास्त्र रे नियमो रे मुताबिक वणियोडो हैं। इणरे चारो औंर गहरी खाई खोदीयोडी हैं। इणरो परकोटो 5 हजार फ़ीट लम्बो हैं। इण प्राचीर मे 28 बुर्जा औंर दोहरा परकोटा हैं।ओ दुर्ग चारो औंर सु रेत रे धोरो सु घिरयोडो हैं। नागौंर दुर्ग रो मुख्य द्वार बडो भव्य हैं। इ द्वार पर विशाल लोहे री सींंखचो वालो फ़ाट्क लागियोडो हैं।दरवाजो रे दोनो ओर विशाल बुर्ज औंर धनुषाकार भाग ऊपर 3 द्वार वालो झरोखा वणियोडा हैं।अठे सु आगे किले रो दूसरो विशाल दरवाजो हैं। बिरे बाद 60 डिग्री रो कोण बणतो तीसरो विशाल दरवाजो हैं। इ दो दरवाजो रे बीच रे भाग ने धूधस केविजे हैं।किले रो परकोटो दोहरो वणियोडो हैं।तीसरे परकोटो ने पार करने पर किले रो अन्तःभाग आ जावे हैं। किले रे 6 दरवाजा हैं । जिका सिराइ पोल , कचहरी पोल, सूरज पोल,घूषी पोल औंर राज पोल रे नाम सु जाणा जावे हैं। किले रे दक्षिण भाग मे एक मस्जिद हैं। इ मस्जिद ने शाँहजहा बणवाया था।

इतिहास
केन्द्रीय स्थल पर होणे कारण ई दुर्ग ने बार बार मुगलो रे आक्रमण रो शिकार होणो पडियो । महाराणा कुंभा भी दो बार नागौंर पर आक्रमण करियो। जिकामे बे सफ़ल हुया ।मारवाड रा शासक बख्त सिंह रे समय इ दुर्ग रो पुर्ननिर्माण करवायो गयो । ए किले री सुरक्षा व्यवस्था ने मजबूत करिया। मराठा भी इ दुर्ग ऊपर आक्रमण करियो। महाराणा विजय सिंह ने भी मराठो रे हमलो सु बचणे वास्ते कई महीनो तक दुर्ग मे रेवणो पडियो।ओ दुर्ग पांचाल नरेश द्रुपद रे आधिपत्य मे हो जिके ने अर्जुन जीतणे बाद द्रोणाचार्य ने सौंंप दियो हो।

ऐतिहासिक युद्ध

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राजस्थान रा एतिहासिक युद्ध
युद्धरोनामसनकिणयौद्धाओरेबीचकुणजीत्यो
तराईन प्रथम1191पृथ्वी राज /मुहम्मद गौरीमुहम्मद गौरी
तराईन द्वितीय1192पृथ्वी राज /मुहम्मद गौरीमुहम्मद गौरी
रणथम्भौर युद्ध1301हम्मीरदेव चौहान /अलाउद्दीन खिलजीअलाउद्दीन खिलजी
चित्तौड युद्ध1303राणा रतनसिह /अलाउद्दीन खिलजीअलाउद्दीन खिलजी
जालौर युद्ध1311अलाउद्दीन / कान्ह्डदेवअलाउद्दीन खिलजी
खातौली युद्ध1518महाराणा सांगा / इब्राहिम लोदीमहाराणा सांगा
गागरोन युद्ध1519महाराणा सांगा/महमूद खिलजी द्वितियमहाराणा सांगा
सामेल (जैतारण ) युद्ध1544मालदेव / शेरशाहशेरशाह
खानवा युद्ध1527महाराणा सांगा / बाबरबाबर
हल्दी घाटी युद्ध18जून 1576महाराणा प्रताप / मानसिंहमहाराणा प्रताप

माजिसा रानी भाटीयानी

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माजीसा राणी भटियाणी
मेहवा रा शासक रावल मल्लिाथजी री चवदमीं पीढी में रावल कल्याणमलजी जसोल रा शासक हुया। रावल कल्याणमलजी, रावल जैतमलजी रा पाटवी पुत्र हा जिका आपरै पिता रै बैद जसोल री गादी माथै विराजिया। कल्याणमल रै जोपुर रा महाराजा अभयसिंह अर बखतसिंह रै अणबल रौ वैवार रैयौ। महाराजा अभयसिंह कल्याणमल नै दबावण सारू घणा तपिया। महाराजा अभयसिंह नै वि.सं. 1787 (ई.स. 1730) में बादस्या गुजरात रै नवाब सरबुलंदखां नै दबावण वास्तै गुजरात भेजिया तद महाराजा मारवाड़ रा सैंग सामंतां, उमरावां नै इण जुद्ध में लड़ण वास्तै बुलाया। इण मौकै माथै रावल कल्याणल ई हाजर हुया अर आपरी फौज लेय'र महाराजा रै सातै गुजरात जुद्ध मांय गया। जुद्ध में जबरा लड़िया अर सेवट महाराजा री फतै हुई। 
भटियाणी माता अर माजीसा रै रूप में सुचावी भटियाणी राणी स्वरूपदे जसोल रै रावल कल्याणमल (रावल कल्याणसिंह राठौड़) री पत्नी ही अर जैसलमेर रै भाटी राजपूत जोगीदास री पुत्री ही। रावल कल्याणमल राव मल्लिनाथ रा वंशज हा अर दूधावत महेचा हा। वै वीर अर ज्ञानी हा। उणां रा दो ब्याव हुया हा- अेक तौ भटियाणी स्वरूपदे सूं, जिकी जोगीदास पृथ्वीराजोत री पुत्री ही, अर दूजौ देवड़ी अमोलकदे सूं, जिकी दलेलसिंह जगसिंघोत री पुत्री ही। भटिय.ाणी स्वरूपकंवर मानता प्राप्त राणी ही। वां अणूंती ई सुंदर तौ ही ई, साथै ई बौत सहनसील ई ही। दूजी राणी देवड़ी अमोलकदे नै ऊणसूं घणी ईरसा हा। सो अेक दिन वा स्वरूपकंवर नै ज्हैर देय'र आपरी ईरसा री आग शांत करी। 
वां ई दिनां जैसलमेर रा दो ढोली शंकर अर ताजिया अचाणचक रावल कल्याणमल रै दरबार मांय मांगण सारू गया तौ जैसलमेर रा रैवासी जाण'र उणां नै कैईजियौ के थांरी बाईसा तौ अबै मसाणां में विराजै, सो उठै जाय'र सीख लीजौ। वा मूंडै मांगी सीख देय देवैला। शंकर अर ताजिया राणी स्वरूपदे री चिता-स्थली माथै पूगिया अर हियै तणा उद्गार प्रगट करता थकां मांगणी सारू वीणती सरू करी। सुरगवासी राणी तद प्रगट हुय'र उणां री मांगणी पूरी करी। इण चमत्कारा री खबर देखतां-देखतां च्यारूंमेर फैलगी। तद राव कल्याणमल रा परिजन मसाण मांय जाय'र छिमा-जाचना करी अर पछै, उणरी पूजा-अरचणा सरू करी। 
तद सूं ई भटियाणी राणी स्वरूपकंवर रै चमत्कारां रौ औ सिलसिलौ चालतौ आय रैयौ है अर आज पण ई चाल रैयौ है। श्रद्धालु भगत इणां री चरण-पादुका अर प्रतिमा रै दरसणां सारू जसोल पूगै अर इणां रै मिंदर मांय जाय'र भेंट स्वरूप प्रसाद ई चढावै। जसोल मांय उणां रै थान री जगै मिंदर बणियोड़ौ है। भाटियां री पुत्री हुवण री वजै सूं 'राणी भटियाणी' रै नाम सूं औ दरसणजोग स्थान चावौ है। इण नाम रै अलावा 'लख्यो राणी', 'जैसलमेरी घणियाणी', 'कंवराणी साहबा' इत्याद नामां सूं ई इणां नै श्रद्धा साथै पुकारियौ जावै। मरियां रै पैला इणां रै मूंडै सूं औ निकलियौ हौ- "म्हैं तो पुजीजूंला अर थै थांरी भुगतौला!" सौ सती रै सत-वचनां नै आज ई लोग बडी सरधा अर भगति रै रूप मांय लोकगीतां अर भजनां में गावै- 
"भटियाणी, थारौ परचौ साचौ रै !"
कोई तीन सौ बरस पुराणौ जसोल ठाकर कानी सूं बणवायोड़ौ भटियाणी माता रौ स्थान आज पण धारमिक दीठ सूं गलां रौ ई श्र्‌धा रौ ई श्रद्धा रौ केन्द्र बणियोड़ौ है। उठै आयै बरस भादवै अर वेसाख महीनै री सुदी तेरस-चवदस नै विसाल पैमानै माथै मेला लागै। आं मेलां मांय नीं सिरफ राजस्थान रा इज, बल्कै गुजारात, महाराष्ट्र्, उत्तरप्रदेश, मद्रास, दिल्ली इत्याद प्रदेशां सूं हजारूं लोग दरसणां सारू जसोल पूगै। अै मेला दो दिन तांी चालतौ रैवै। बीमारियां सूं परेस्यान, औलाद सारू उत्सुक अर वौपार-नौकरी में जस हासिल करण वालां री लांबी कतारां माजीसा रै मिंदर मांय लागियोड़ी रैवै। श्रद्धा अर आस्था राखण वाला लोग माजीसा रै चमत्कारां सूं आपरौ जीवण सुखी बणावता आया है। माजीसा रै मिंदर सगलै ई अेक हुय'र आवै अर सीस नवाय'र आपरी मांगणी मांग'र, खुस हुय'र बावड़ जावै। मिंदर रै प्रांगण मांय जातरूवां रै विसराम सारु माजीसा रा भगत जन आपरी इंछा सूं दान देवण में आगीवाण रैवै। मेलै रै दिनां मांय राणी भाटियाणी रै लोकगीतां-भजन कीरतनां अर वाणियां री गूंज लागियोड़ी रैवै। 
भटियाणी राणी रै चमत्कारां सूं प्रभावित हुय'र ई राजस्थान रै बाड़मेर जिलै री विकासशील पंचायत समिति, बालौतरा इणई धारमिक स्थल रै छेत्र मांय राणी भटियाणी री याद में 'राणी भटियाणीजी विराट पशु-मेला' रौ आयोजन करती रैयी है। इण पशु-मेला मायं हजारूं री संख्या में उत्तम नस्ल रा थारपारकर अर कांकरेज रा बलद, मालाणी रा घोड़ा, गायां, भैस्यां, बकरा-बकरियां, ऊंट-सांडियां, टोडिया, खच्चर, भेडां इत्याद अेकठ हुवै। मेलै मांय पशुवां री खरीद बिक्री सारू समुचति व्यवस्था करीजै। राजस्थान रै अलावा गुजरात, पंजाब, हरियाणा, उत्तरप्रदेश, मध्यप्रदेश इत्याद रा चावा वौपारी पशुवां री खरी सारू आवै। 
आथूणै राजस्थान मांय राणी भटियाणी री मानता हदभांत ई देखण में आवै। केई नगरां अर गांमां मांय राणी भटियाणी रा स्थान है, जठै लोग श्रद्धा-आस्था सूं आवै अर कस्टां सूं छुटकारौ पावै। मुख्य थान तौ मिंदर रै रूप में जसोल मांय है इज।

आई माता

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आईमाता
आईमाता रै रूप में पुजीजण वाली जीजी रौ जनम बीका नाम रै राजपूत रै घरै हुयौ हौ जिकौ डाबी वंस रौ हौ। जीजी रौ जनम वि.सं. 1472 रै आसै-पासै हुयौ। बीका डाबी कीं बगत बाद गुजरात रै अंबापुर नगर मांय आय'र रैवण लागियौ। जीजीबाई रौ सरू सूं ई देवी रौ पूरौ इष्टो हौ, सो अंबापुर मांय अंबायजी री सेवा करण लागी। जीजीबाई अणूंती रूपवती ही, सो ऊणरै रूप री चरचा सुण'र मांडल (मांडू) रौ बादसा महमूद खिलजी उणसूं ब्याव करणौ चावतौ हौ। वौ बीका डाबी नै बुलाय'र आ बात उणरै सामी राखी अर साथै औ ई कैयौ के जे थूं थारी लड़की री शादी म्हारै साथै नीं करैला, तौ म्हैं जबरदस्ती उठाय'र उणरै साथै ब्याव कर लूंला।
जद चिंता में पडियौड़ौ बीका डाबी घरै आयौ अर बेटी रै पूछियां सारी बात बताई तौ बेटी जीजीबाई बोली के आप चिन्ता मत करौ, उणनै तौ म्हैं आछी तरियां समझावूंला। पछै आपरै पिता नै कैयौ के आप जाय'र उण दुस्ट नै कैय आवौ के म्हैं म्हारी बेटी रौ ब्याव थारै साथै हिंदू मजहब रै मुताबिक करूंला, सो थांनै बरात लेय'र म्हारै गाम तांई आवणौ पडै़ला। जे आपनै गरीब समझ'र वौ कीं ई सामान साथ लिजावण सारू कैवै तौ आप मना कर दीजौ, कीं ई सामान मत लाईजौ। बीका डाबी जाय'र बादसा नै ब्याव री बात बताय दी। ब्याव रौ कोडायौ बादसा बात स्वीकार कर लीवी अर बरात लेय'र अंबापुर आय पूगियौ। जीजीबाई रै कैयां बीका डाबी बादसा री बरात नै तलाव माथै ठैराय'र कंवाररै भात रौ न्यूतौ देय आयौ। जीजीबाई अेक छोटी सी झूंपडी मांय बैठ'र बरात सारू जीमण रौ प्रबंध करि दियौ। बादसा रा आदमी आवता रैया अर जीमण रौ सामान लिजावता रैया। बादसा इचरज में पड़ग्यौ के अक गरीब राजबूत कनै इत्तौ सामान कठै सूं आयौ। कोई देवी करामात तौ उणरै कनै नीं? बादसा जांच करण नै सेवट उण झूंपड़ी कनै पूगियौ, जिण मांय जीजीबाई बैठी ही। तद जीजीबाई उणनै समझावण सारू झूंपडी सूं बारै निकली। बादसा नै अैड़ौ लखायौ मानौ कोई सिंघ सामी ऊभौ है। बादसा घबराग्यौ अर हेठै पड़ग्यौ। पछै प्रार्थना करण लागियौ के अम्मा, म्हैं भूल करी। म्हैं अबै थारै साचै रूप नै पिछाणग्यौ, अबै थूं म्हारां अपराधां नै छिमा कर। बादसा री प्रार्थना माथै जीजीबाई उणनै छोड दियौ अर हिंदुवां माथै लागण वाला केई 'कर' उणसूं छुडवाया। देवी जद तांी अंबापुर रैयी, बादसा तद तांी उणरै दरसणां सारू आया करतौ अर जोत सारू सामान भिजवाया करतौ।
कीं ई बगत में जीजी बाई री सिद्धाई री चरचा च्यारूंमेर फैलगी, सो जनता उणां रै दरसणां सारू आवण लागी। आपरी तपस्या में विघन पड़ता देख त माता-पिता रै साथै मेवाड़ राज्य में नारडाई में आयगी। कीं अरसै तांई अठै ठैर'र अखंड जोत थापन करी, पछै डायलाणै नाम रै गाम मांय आई। क्यूंकै गुजरात सूं मेवाड़ में देवी आई, सो जीजी रै स्थान माथै देवीजी नै लोग 'आईजी' रै नाम सूं बतलावण लागग्या। इण भांत जीजीबाई रौ नाम पैला देवीजी पड़ियौ अर पछै 'आईजी'।
डायलाणै मांय आईजी रै थरप्योड़ौ बड़ 'जीजीबड़' रै नाम सूं चावौ रैयौ। डायलाणै सूं रवाना हुय'र देवी पैला सोजत आई। उठै देवली रा दरसण करण नै राण कुंभा रा बेटा रायमल आया, जिका देस-निकालौ भुगत रैया हा। बाद में देवी रै कैयै मुजब रायमलजी मेवाड़ री राजगादी माथै बैठिया।
सोजत मांय कीं बगत बितायां रै बाद देवी वि.स.ं 1521 में बिलाड़ा आई। उण बगत बिलाड़ा रा अधिपति राव जोधाजी रा बेटा भारमलजी हा। देवी अबै घणी बूढ़ी हुय चुकी ही, सो तपस्या में विघन पड़तौ देख'र बिला सीरवी री ढाणी मांय रैवण लागी। वां दिनां भारमलजी रा कामदार जाणौजी रौ बेटौ किणी बात सूं रूठ'र रामपुरै गयौ परौ हौ, जठै वौ दीवाण बणग्यौ है। जद जाणौजी देवी कनै बेटै रौ ुख लेय'र गया तौ देवी कैयौ के थारौ बेटौ आणंद में है अर रामपुरै मांय दीवाण बणियौड़ौ है। तद जाणौजी देवी सूं प्रार्थना करी के हे मात, थूं माधवदास नै म्हारै सूं मिलवाय दै अर पछै थूं आपरै कनै राख। कीं बगत बाद देवी रै प्रताप सूं माधवदास रामपुर सूं आयग्यौ। बेटै नै देख'र जाणौजी रौ आणंद रौ पार नीं रैयौ अर वै उणनै माताजी रै चरणां में समरपित कर दियौ। माताजी माधवदास माथै आपरौ हाथ मेलियौ अर कैयौ के खूब भूलौ-फलौ। कीं बगत बाद माधवदास पाछौ रामपुरै गयौ अर रावजी सूं इजाजत लेय'र माताजी रै कनै आयग्यौ। उणरै पछै माताजी री इज सेवा मांय रैयौ। माताजी माधवदास रै डोरौ बांधियौ। माताजी माधवदास नै आपरौ प्रधान शिष्य बणायौ अर सगलै शिष्यां नै आग्या दीवी के औ माधव म्हारौ प्रधान है, इणरी आग्या थां सगलां नै मानणी पड़ैला। आं री शिष्य मंडली मांय सीरवी जात रा लोग बेसी हा।
माधवदास जीवण भर माताजी री सेवा मंय रैया अर बूढा हुय'र वि.सं. 1555 में सुरग सिधारिया। अबै माताजी उणां रै बेटै गोविंददास नै माधवदास री जगै प्रधान बणाया। गोविंददास नै औ पद वि.सं. 1557 रै माघ महीनै री चानणी दूज नै दियौ हौ, सो औ दिन डोराबंध लोग बडै उच्छब रै साथै मनावै। माताजी गोविन्ददास नै सगलै ई साधु-सेवकां री मंडली मांय उपदेश दियौ। वि.सं. 1550 सूं 1561 तांई भांत-भांत रा उपदेश दिया अर पछै आपरै सगलै ई अनुयायियां नै अेकठ कर'र कैयौ के आज म्हैं म्हारी जोत गोविन्दास मांय प्रगटूं। अैड़ौ कैय'र माताजी आपरै पाट स्थान कानी अेकांत मांय गोविन्ददास नै वचन सिद्धि री शक्ति दीवी अर सगली ई गुप्त योगाभ्यास री बातां ई समझाय दी। पछै आपरै पाट स्थान रा दरवाजा बंद करवा दिया। गोविन्ददास समेत माताजी पाट स्थान माथै सात दिन तांई बंद रैया। सातवैं दिन रोज जद दरवाजौ खोलियौ गयौ तो सगलां नै अेकाअेक जोरदार प्रकाश दीसियौ। सगलां री ई आंखियां चकाचूंध सूं बंद हुयगी। उणरै बाद गोविन्ददासजी रै पगां मांय सगला ई गिर पड़िया। गोविन्ददास सगलां नै अेकठ कर'र माताजी री आग्यावां समझाय दी।
आई माता रौ से सूं चावौ स्थान बिलाड़ा मांय इज है। अठै अेक भव्य मिंदर बणियौडौ़ है। आज ई बिलाड़ै मांय इणां री गादी अर दीवै री अखंड जोत रा दरसम करण नै हजारूं लोग आवै। अठै रा पुजारी दीवाण बाजै। इणां रा अनुयायी 'आईपंथ' रा 'डोराबंद' बाजै। दरअसल आई माता रै नाम रौ डोरौ बांधियौ जावै, जिणनै वै लोग 'बेल' कैवै। आईपंथी दारू-मांस रौ सेवन नीं करै। आईमाता रै स्थान नै अै लोग बढेर कैवै। हरेक बढेर मांय अेक कोटवाल हुवै जिकौ बढैर रौ काम करै। डोरेबंद नै 'बांढेरू' कैवै। इणां में जिकौ ई साधु हुय जावै। वौ आईजी री पूजा करै। लोग उणां नै 'बाबा' कैय'र बतलावै। आईमाता नै मानणिया घणकरा तौ सीरवी लोग इज है। आईपंथ रै सिद्धान्तां मुजब अै लौग गाड्या ई जावै।
हरेक महिनै रै चानणै पख री बीज नै आईमाता री पूजा हुवै। उण दिन डोराबंद आपरै घरां सूं तरै-तरै रौ भोजन बढेर मांय लावै। आईमाता नै चढायां रे बाद सब प्रसाद बांट दियौ जावै। रात रा आईमाता रै जस रा गीत गाईजै। इणरै अलावा तीन 'बीजां' माथै खास उच्छब हुवै। पैलौ भादवै सुदी बीज नै, दूजौ माघ सुदी बीज नै अर तीजौ बैसाख सुदी बीज नै। भादवै सुदी बीज नै नवी जोत पधराईजै।
बिलाड़ा रै आईमाता रौ बढेर आखै भारत रै सीरवी समाज अर आईपंथी लोगां रौ धारमिक धाम है। मारवाड़़ रै बिलाड़ा कस्बै मांय आईजी रौ मिंदर है। 'खारड़िया सीरवी' (मारवाड़ रौ इतिहास- श्री जगदीशसिंह गहलोत मुजब सीरवी अेक कृषक जात है, जिकी राजपूतां सूं निकली कैयी जावै। औ ई कैयौ जावै कै 13 वीं सदी में अै जालौर माथै राज करता हा। अलाउद्दीन खिलजी रै अत्याचारां सूं सताईज्या अै लोग बिलाड़ा मांय आय'र बसिया अर सीर में खेतीबाड़ी करण सारू लागिया, जिणसूं अै सीरवी कैयीज्या। बाद में आईजी नाम री अेक राजपूत महिला इणां नै आपरै पंथ मांय मिलाया।) आईजी नै आपरी कुलदेवी मानै। आईजी रै मिंदर मांय धी रौ अखंड दीयौ जलतौ रैवै। उणरी जोत सूं पीलै रंग रौ काजल पड़ै, जिणनै केसर केवै। काजल री पीली झंई नै आईजी माता री करामात रौ फल समझियौ जावै। आईजी रा अनुयायी उणां रै नाम रा डोरा बांधै। भादवै री चांनणी बीज आईजी रे लोकान्तरित री तिथ हुवण सूं उण दिन सीरवी परिवार त्यूंहार रै पूर में मनावै। सीरवी आईजी रै मिंदर नै 'दरगाह' ई कैवै अर उठै जाय'र दीयै री जोत अर बिछायोड़ी गादी रा दरसण कर आपरौ धिनभाग मानै।

करणी माता

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करनी माता
माता करनी रौ जनम वि.सं. 1444 री आसोज सुदी 7 परवाणै 20 सितम्बर 1387 ई. शुक्रवार रै दिन जोधपुर रै त्हैत आयै सुवाप गाम मैं हुयौ हौ। इणां रै पिता रौ नाम मेहाजी किनिया हौ अर माता रौ देवल आढी। मूलदान देपावत मुजब करनीजी सूं पैली छह बैनां ही, जद के चंद्रदान चारण मुजब इणां सूं पैली पांच बैनां ही। इणां रै जनम रौ नाम रिद्ध (रिद्धि) बाई हौ। जद भाई रै घरां इणां रै रूप में अेक और बेटी रौ जनम हुयौ तौ इणां रा भुवाजी इणां रै सिर माथै ठोलौ मारतां कैयौ- 'लो, फेर भाटौ आयग्यौ!' ठोलौ मारण रै समजै ई उणां रै हाथ माथै हवा बैयगी, हाथ री आंगलियां आपस में जुड़गी। चंद्रदान चारण मुजब इण चमत्कार नै देख'र इणां रा भुवाजी मेहाजी सूं बोलिया- "आ लड़की संसार में आपरी 'करणी' दिखावैला। इणनै अबै सब 'करणी इज कैवजौ।'' तद सूं ई इणां रौ नाम 'करणी' पड़ग्यौ अर आपरै भावी जीवण में इणी नाम सूं चावा हुया। अंबादान बारठ मुजब पांच बरस बाद जद इणां रा भुवाजी इणां नै सिनान कराय रैया हा तौ अै पूछियौ- "भुवाजी, आपरै हाथ रै ौ कांई हुयग्यौ?" पडूत्तर में भुवाजी मांड'र पूरी बात बताई। उण बगत कन्या रिद्धू उणां रौ हाथ आपरै हाथ में लेय'र सैलावती थकी बोली- "आपरी आंगलियां तौ काम करै है नीं! कियां कैवौ के अै काम नीं करी, सो 'करणी' नामकरण अठै सूं ई हुयौ। मूलादान देपावत मुजब टाबरपणै में आपरा भुवाजी सूं कंधी करावता थकां उणां री आंगलियां नै सीधौ करण वाली 'करणी' बाजी। जूनी लिखावट में अक ग्रंथां में करनी सबद रौ इज प्रयोग मिलै। आजादी रेै बाद राजस्थानी रूप बणावण रै प्रभाव सूं 'करणी' सबद रौ इज प्रयोग मिलै। आजादी रै बाद राजस्थानी रूप बणावण रै प्रभाव सूं 'करणी' सबद प्रचलित हुयौ जिणरी आज देखादेखी सब लोग लिखै। इणां रै जनम बाबत अेक दूहौ इण मुजब देखम जोग है- 
दुसल सुत मेहा घरै, गाम सुवाप मंझार। 
चौदह सौ चमालवैं, आय लियौ अवतार।। 
करनीजी रौ ब्याव लगैटगै 21 बरस री उमर में साठीका गाम रै बीठू कैलू रै बेटै देपाजी सूं हुयौ हौ। चंद्रदान चारण मुजब परणीज'रर साठीका जावतां वै आपरै पति नै मारग मैं ई आपरै जीवण रौ उद्देस बतावता थकां साफ कैय दियौ हो के उणरौ जीवण सांसारिक सुख भोगण अर घर गिरस्थी चलावण खातर नीं हुयौ है, बल्कै राव अर रंक नै सदाचार, न्याव अर मरजादा रौ मारग बतावण सारू हुयौ है। जिका के भोली -ढाली गरीब जनात माथै भांत-भांत रा अन्याव कर अत्याचार करै। कैयौ जावै के करनीजी रै अनुरोध करियां देपौजी उणां री छोटी ब ैन गुलाब बाई सूं ब्याव कर्यौ जिणसूं उणां रै च्यार बेटा अर अेक बेटी हुई। किशोरसिंह बार्हस्पत्य ई 'करनी चरित्र' में ई देपौजी रै गुलाब बाई सूं दूजै ब्याव री बात लिखी है। किणी ई प्राचीन ख्या, पुराभिलेख इत्याद में अैड़ौ उल्लेख नीं मिले। बख्तावर मोतीसर रचित 'करनी-प्रकाश' मुजब करनीजी रै च्यार बेटा पूनौ, नगौ, सीहौ अर लाखण पैदा हुया हा। करनीजी रै जनम सूं पैली इम मरूछेत्र में अनेकूं छोटा-छोटा राज्य हा। वै अेक दूसरै रै अठै लूट-मार कर्या करता हा। इण सूं इण छेत्र री प्रजा अणूंती ई दुखी ही। जद वि. सं. 1300 रै आसै-पासै राठौड़ कुंवल सेतराम रै बैटे राव सीहा रौ अभ्युदय हुयौ तद मारवाड़ रै पाली अर उणरै आखती-पाखती रै इलाकां में मुसलमाना शासकां रौ अत्याचार अणूंतौ ई बधग्यौ हौ। प्रजा री पुकार माथै राव सीहा आपरौ राज्य थापन कर्यौ। राव सीहां सूं लेय'र राव वीरम तांी राठौड़ां री कोई दस पीढियां लगौलग मारवाड़ री प्रजा री सुरक्षा अर भलाई सारू बडी-बडी लड़ाइयां लड़ी अर आपरौ बलिदान दियौ। वि.सं. 1440 में जद वीरम जुद्ध में काम आयग्यौ तौ उणरौ बेटौ चूंडौ गादी माथै बैठ्यौ। वि.सं. 1475 में कान्है रौ देहांत हुयग्यौ अर गादी माथै उणरौ भाई सत्तौ बैठ्यौ। राव सत्तै रै बाद रणमल नै करनीजी री किरपा सूं जांगल रौ राज्य प्राप्त हुयग्यौ हौ अर उणां रै ई आसीरवाद सूं वि.सं. 1487 में उणरौ मंडोर माथै ई अधिकार हुयग्यौ हौ। रणमल रै चित्तौड़ मार्यौ जावण रै बाद वि.सं. 1496 री काती बद पांचम नै राव जोधै रौ राजतिलक हुयौ तौ करनीजी आपरै बेटै पुण्यराज (पूनै) नै राजतिलक सारू भेज्यौ। उण बगत मंडोर माथै महाराणा कुंभा रौ अधिकार हौ। वि.सं. 1510 में राव जोधै जोधपुर दुरग री नींव करनीजी रै हाथां सूं रखवाई। राव जोधै जोधपुर रौ राज्य आपरै बडै बेटै बीकै नै नीं देय'र आपरी हाडी राणी जसमादे रै बेटै सातल नै देवणा चावता हा। इण बात सूं उणरौ भाई काधल नाराज हुयग्यौ अर बात बधगी। बीकै नै छोटा-मोटा राज्य फतै कर'र नवै राज्य रौ राजा बणावण री तेवड़'र वौ उणनै लेय'र जोधपुर सूं निकलग्यौ। कांधल अर बीकौ दल-बल समेत देशनोक करनीजी कनै पूग्या। अर करनीजी रै आसीरवाद अर सहायता सूं ई वै ई छोटै-मौटै राज्यां माथै फतै हासल करी। 
आवड़ तूठी भाटियां, गीगाई गौडांह। 
श्री बरवड़ सीसोदियां, करणी राठौडांह।। 
मतलब- "राजस्थान रै च्यार राजपूत कुलां माथै च्यार शक्तिसरूप देवियां रै वरदहस्त रैयौ, जिणसूं उणां रौ राजकुलां रै रूप में अभ्युदय हुयौ। भाटियां माथै आवड़, गौडां माथै गीगाई, सीसोदियां माथै बरवड़ अर राठौड़ां माथै करणी तूठी।" उण बगत राठौड़ां रै प्रति भाटियां रौ बैर अेक अभिशाप-सो बण्यौड़ौ है। सो करनीजी दिव्यशक्ति सूं कोी तजबीज बैठावण लाग्या। उणं दिनां पूगल रौ राव सेखौ मुलतान री कैद में हौ। राव सेखै री पत्नी कररनीजी सूं उणनै छुटवावण री अरज करी। उचित मौकौ देख'र करनीजी सेखै री पत्नी सूं बीकै सारू उणरी बेटी रंगकुंवर रौ हाथ मांग्यौ। सेवट वि.स.ं 1539 में बीकै रौ ब्याव रंगकुंवर रै साथै सम्पन्न हुयौ। कन्यादान रै बगत करनीजी राव शेखै नै मुगत करवा'र राजर कर दियौ। भाटियां सूं ब्याव-संबंध हुय जावण सूं बीकै सारू आपरै नवै-नवै राज्य रै बधापै रा मारग खुलग्या तौ करनीजी राती घाटी में वि.सं. 1542 में बीकानेर दुरग री नींव राखी। वि.सं. 1545 री बैसाब सुदी बीज, शनिवार रै दिन दुरग अर नगर री प्रतिष्ठा करीजी। इण मौकै कांधल बीकै रौ राजतिलक करनीजी रै हाथां सूं करवावण रीं इंछा लियां देशनोक पूग्यौ। पण करनीजी कैयौ के म्हैं रणमल अर जोधै रे राजतिलक रै बगत ईं नीं गई, सो अबै ईं नीं चालूंला।आपरै बेटै पुण्यराज (पूनै) नै भेज दियौ। इण भांत करनीजी री किरपा अर सहायता सूं बीकै नै आपरै पिता राव जोदै सूं ई बडै राज्य रौ राजा बणण रौ सौभाग मिल्यौ। 
करनीजी जद लगैटगै 67 बरस रा हा त उणां रै पति देपौजी रौ देशनोक में सुरगवास हुयग्यौ ह। अैड़ी धारणा है े करनीजी आपरै शरीर रौ त्याग लगैटगै 151 बरस री उमर में कर्यौ। 
देशनोक में आयौड़ै निज मिंदर रौ शुभारंभ करनीजी रै बणायौडै गुंभारै सूं ई हुयौ जिणनै करनीजी पूजा स्थल रै रूप मे ंकाम मे ंलिया करता हा। करनीजी री आग्या सूं ई उणां रै भगत जैसलमेर रै शिल्पकार बन्नै खाती रै हाथां बणायोड़ी प्रतिमा वि.सं. 1595 री चैत सुद चवदस, शनिवार रै दिन थापन करीजी। तद सूं उणां रै च्यारूं पेटां रा वंशज लगौलग पूजा अरचणा करता आय रैया है। जद सूं लेय'र आज तांी करनीजी रौ औ मिंदर नित निखरीजतौ थकौ मौजूदौ सरूप पायौ है। करनीजी सूं संबंधित केई चमत्कारजनक घटनावां अर उणां रै दियोड़ा परचा चावा है। करनीजी सूं संबंधित अणमाप साहित्य काव्य रै रूप में मिलै, जिणरौ सिरजण चारण कवियां कर्यौ है। करनीजी सूं संबंधित तीन खास पीठ-स्थन है- सुवाप, देशनोक अर धिनेरी। 
दयालदास सिंढायच री ख्यात मुजब वि.सं. 1594 री चैत बदी बीज रै दिन करनीजी आपरै हाथां सूं गुंभारौ बणायौ जिणमे जाल रा लट्ठा काम में लिया। गुंभारौ बणाय'र करनीजी जैसलमेर पधारिया। जैसलमेर पूग'र रावण जैतसी नै नीरौगौ कर्यो। उठै सूं बावड़ता अै बैंगटी पूग्या जठै हरभू सांखलौ उणां सूं रोटी री मनवार करी। त करनीजी कैयौ- ''हरभू ! संतोख कर भाई ! " बैंगटी सूं गाम गड़ियालै आया जठै खराढञ्या तलाई ई ही। इण तलाई रै कनै ई धिनेरी तलाई ई ही। जठै करनीजी रथ रूकवा'र उतर्या। आ तलाई बीकानेर अर जैसलमेर राज्यां री सींव माथै आई थकी है। दयालदास री ख्यात मुजब अठै इज वि.सं. 1595 री चैत सुदी 9, गुरुवार रै दिन आपरौ शरीर-त्याग कर्यौ। उण बगत इणां रौ बेटौ पूनौ ई साथै हौ।

सवाई जय सिंह

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सवाई जयसिंह
आमेर रे महाराजा विशाखसिंह रे पुत्र सवाई जयसिंह 1727 में जयपुर रे गुलाबीनगर रो शिलान्यास करियो। सवाई जयसिंह खाली राजा हि नीं था बल्कि ज्योतिषी, वास्तुकार, प्रशासक, इतिहासकार, विद्वान अर वैज्ञानिक भी था। सवाई जयसिंह देहली, जयपुर, उज्जैन, बनारस अर मथुरा रे जन्तर मन्तर रो निर्माण करवायों। इण जन्तर मन्तर रे समय, सूर्य अर चन्द्रमा रो आभास आसानी सु करियो जा सके है।

महाराणा प्रताप

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महाराणा प्रताप
जन्म -9 मई 1540
पिता - महाराणा उदयसिंह 
माता - जेवन्तीबाई सोनगरी
विमातायां - संध्याबाई सोलंकना, जेवंताबाई मोदडेचो, लालबाई परमार, धारबाई भटयाणी (जगमालजी री मां), गणेशदे चहुवान, वीरबाई झाली, लखांबाई राठोड, कनकबाई महेची,----खीचण।
भ्राता - शक्तिसिंह, कान्ह, जेतसिंह (जयसिंह), वीरमदेव, रायसिंह (रायमल), जगमाल, सगर, अगर, पंचारण, सीया, सुजाण, लूणकरण, महेशदास, सार्दूल, रूद्रसिंह, (इन्द्रसिंह), नेतसिंह, नगराज, सूरताण, भोजराज, गोपालदास, साहबखान।
बहिनां - हरकुंवरबाई अर 16 अन्य।
पत्नियां - अजवांदे परमार (महाराणा अमरसिंह की मां) पुरबाई सोलंकनी, चंपाबाई झाली, जसोदाबाई चहुवान, फूलबाई राठोड, सेमताबाई हाडी आसबाई खीचण, आलमदे चहुवान, अमरबाइ राठोड, लखाबाई राठोड, रतनावती परमार।
पुत्र - महाराणा अमरसिंह, सीहो, कचरो, कल्याणदास, सहसो (सहसमल), पुरी (पुरणमल), गोपाल, कल्याणदास, भगवानदास, सावलदास, दुरजणसिंह, चांदो, (चन्द्रसिंह), सुखी (सेखो) हाथी, रायसिंह, मानसिंह, नाथसिंह, रायभाण, जसवन्तसिंह।
महाराणा प्रताप उदयपुर मेवाड में शिशोदिया राजवंश रा राजा हा। अे कई साला तक मुगल सम्राट अकबर साथै संघर्ष करियो। इतिहास में इयारो नाम वीरता अर दृढ़ संकळ्प वास्ते प्रचलित है। महाराणा प्रताप रो जनम राजस्थान रे कुम्भलगढ़ में महाराणा उदयसिंह अर महाराणी जीवंत कंवर रे घर में हुयो।
राणा उदयसिंह रे बाद महाराणा प्रताप मेवाड रा शासक बणिया। एक बार जद अकबर मानसिंह ने आपरो दूत बणा'र महाराणा प्रताप ने अधीनता स्वीकार करणे वास्ते भेज्यो तो महाराणा प्रताप इण प्रस्ताव ने ठुकरा दियो। बाद में वां ने कई संकटा सु गुजरणो पडियो, पण बे अकबर सु संधि नीं करी। वां मानसिंह साथे भोजन ना कर आपरे स्वाभिमान रो परिचै दियो और इणरो परिणाम 1576 रो हल्दीघाटी रो युद्ध हुयो।
इण युद्ध में राणा प्रताप और मानसिंह रो मुकाबलो हुयो। 1576 रे हल्दीघाटी रे युद्ध में महाराणा प्रताप 20,000 राजपूता ने लेर मानसिंह री 80,000  री सेना रो सामनो करियो। इण युद्ध में महाराणा प्रताप रो प्रिय घोडो चेतक मानसिंह रे हाथी रे माथे पर आपरा पैर जमा दिया और महाराणा प्रताप आपरै भाले सूं विण पर वार करियो पण मानसिंह हौद में जा'र छिप ग्यो और बच निकळियो। चेतक री टांग टूटणे सु थोडी दूरी पर ही विणरी मौत हुयगी, आ लडाई कई दिनां तक चाली। अंत में मानसिंह बिना जीतया वापस लौट ग्यो। राणा मुगला ने बहोत छकाया, जिके रे कारण वे मेवाड सु भाग निकळिया। इणरे बाद राणा ने दिकता उठाणी पडी पण वियारा मंत्री भामाशाह आपरी निजी सम्पत्ती दे'र राणा री सेना तैयार करणे में मदद करी। इण सेना रे सहयोग सूं मेवाड री खोई भूमि अकबर सूं पाछी मिलगी। फेर भी चित्तौड अर मांडलगढ बिणरे हाथ में नीं आ सकिया। विण री राजधानी चांवड नामक कस्बे में ही, जठे 1597 में महाराणा प्रताप री मौत हुई और जठे वियारे स्मारक रे रूप में एक छतरी आज भी बणियोडी है।
महाराणा प्रताप रे जीवन रा प्रमुख घटनाक्रम
अकबर द्रारा मेवाड, अजमेर, नागोर अरे जेतारण विजय1556, 1557
कुंवर अमरसिंह रो जन्म16 मार्च, 1559
महाराणा उदयसिंह द्वारा उदयपुर बसाणो1559
सिरोही रे देवडा राव मानसिंह रो मेवाड में शरण लेवणो1562
मालवा के बाजबहादुर का मेवाड में शरण लेना1562
अकबर री आमेर सु संधि1562
अकबर द्वारा मेडता विजय और जयमल रो चित्तौड आगमन1562
उदयसिंह री भोमट रे राठोडा पर विजय1563
अकबर रो जोधपुर पर आक्रमण अर विजय1563
महाराणा उदयसिंह द्वारा चित्तौड रो त्याग1567
अकबर द्वारा चितौड विजय25 फरवरी, 1568
अकबर द्वारा रणथम्भौर विजय24 मार्च, 1563
अकबर रो नागोर दरबार अर जोधपुर, बीकानेर, जैसलमेर रो मुगल अधीनता स्वीकार करना5 नवम्बर सु 25 दिसम्बर, 1570
उदयसिंह री मृत्यु प्रताप अर प्रताप रो गोगूंदा में राजतिलक28 फरवरी, 1572
मुगलदूत जलालखां कोरचे रो मेवाड आणोअगस्त-सितम्बर 1572
कुंवर मानसिंह कछवाहा रो अकबर रे दूत री तरह मेवाड आ'र प्रताप सु मिलणोअप्रेल, 1573
अकबर रे तीसरे दूत भगवन्तदास रो प्रताप सु मिलनोसितम्बर-अक्टूबर, 1573
हल्दीघाटी रो युद्ध18 जून, 1576
ईडर रा नारायणदास, सिरोही रा सुरताण, जालोर रा ताजखां, जोधपुर रा चन्द्रसेन, बूंदी रा दूदा द्वारा मुगल विरोधी कार्यवाहियांजून-अकटूबर, 1576
प्रताप द्वारा गोगूंदा वापस लेवणो अर शाही थाणा पर आक्रमणअगस्त-सितम्बर, 1576
मुगल सेनायां द्वारा जालोर, सिरोही, अर ईडर विजय करणोअकटूबर, 1576
अकबर री मेवाड पर चढाईअक्टूबर 1576
ईडर रे नारायणदास, सिरोही रे राव सुरताण री फेर मुगल विरोधी कार्यवाहियांजनवरी-फरवरी, 1577
मुगल सेना द्वारा फेर ईडर विजय करणो29 फरवरी, 1577
मुगल सेना द्वारा बूंदी विजय करणोमार्च, 1577
प्रताप द्वारा मोही अर दूजा मुगल थाना पर आक्रमण अर विजयअक्टूबर, 1577
शाहबाजखां री मेवाड पर चढाई25 अक्टूबर, 1577
शाहबाजखां द्वारा कुम्भलगढ विजय3 अप्रेल, 1578
प्रताप द्वारा छप्पन रे राठोडा रे विद्रोह ने दबाणो अर चावंड राजधानी बणानो1578
भामाशाह रो मालवा पर आक्रमण अर प्रताप ने लूट रो धन भेंट करणो1578
प्रताप री सेना रो डूंगरपुर-बांसवाडा पर आक्रमण1578
शाहबाजखां रो दूसरो आक्रमण15 दिसम्बर 1578
शाहबाजखां रो तीसरो आक्रमण9 नवम्बर, 1578
प्रताप द्वारा मेवाड रे मैदानी भाग सु मुगल थाणो उठाणो और मांडलगढ़, चित्तौडगढ तक आक्रमण करणो1580-1589
प्रताप रे मुगल सेवक भाई जगमाल रो सिरोही रे राव सुरताण रे विरूद्ध युद्ध में मारो जाणो15, अक्टूबर, 1586
मुगल सेनापति जगन्नाथ कछवाहा री मेवाड पर चढाईदिसम्बर, 1584
जनन्नाथ कछवाहा रो प्रताप रे निवास स्थान (चावंड) पर आक्रमणसितम्बर, 1585
खानखाना रे परिवार रे स्त्री-बच्चा रो सादर लौटणो1585
प्रतापगढ द्वारा मांडलगढ, चित्तौडगढ छोड'र पूरे मेवाड पर पुनर्विजय1586
महाराणा प्रताप री चावंड में मृत्यु19 जनवरी, 1597
कविता - पाथळ अर पीथळ
रचनाकार, स्वर्गीय कन्हैयालाल जी सेठिया
अरै घास री रोटी ही जद बन बिलावडो ले भाग्यो । 
नान्हो सो अमरयो चीख पड्यो राणा रो सोयो दुख जाग्यो ।
हूं लडयो घणो हूं सहयो घणो 
मेवाडी मान बचावण नै ,
हूं पाछ नही राखी रण में 
बैरया रो खून बहावण में ,
जद याद करू हळदी घाटी नैणा मे रगत उतर आवै ,
सुख दुख रो साथी चेतकडो सूती सी हूक जगा ज्यावै ,
पण आज बिलखतो देखूं हूं 
जद राज कंवर नै रोटी नै ,
तो क्षात्र - धरम नै भूलूं हूं 
भूलूं हिंदवाणी चोटी नै
मेहलां में छप्पन भोग जका मनवार बिना करता कोनी ,
सोनै री थाळयां नीलम रै बाजोट बिना धरता कोनी ,
अै हाय जका करता पगल्या 
फ़ूला री कंवरी सेजां पर ,
बै आज रूळे भूखा तिसिया 
हिंदवाणै सूरज रा टाबर ,
आ सोच हुई दो टूक तडक राणा री भीं बजर छाती ,
आंख्यां मे आंसू भर बोल्या मैं लिख स्यूं अकबर नै पाती ,
पण लिखूं किंयां जद देखै है आडावळ ऊंचो हियो लियां ,
चितौड खडयो है मगरां मे विकराळ भूत सी लियां छियां ,
मैं झुकूं कियां ? है आणा मनै 
कुळ रा केसरिया बानां री ,
मैं बुझूं किंयां ? हूं सेस लपट 
आजादी रै परवानां री ,
पण फ़ेर अमर री बुसक्यां राणा रो हिवडो भर आयो ,
मैं मानूं हूं दिल्लीस तनै समराट सनेसो कैवायो । 
राणा रो कागद बांच हुयो अकबर रो सपनूं सो सांचो 
पण नैण करयो बिसवास नहीं जद बांच बांच नै फ़िर बांच्यो ,
कै आज हिंमाळो पिघळ बह्यो 
कै आज हुयो सूरज सीटळ ,
कै आज सेस रो सिर डोल्यो 
आ सोच हुयो समराट विकळ ,
बस दूत इसारो पा भाज्या पीथळ नै तुरत बुलावण नै ,
किरणां रो पीथळ आ पूग्यो ओ सांचो भरम मिटावण नै ,
बी वीर बाकुडै पीथळ नै 
रजपूती गौरव भारी हो ,
बो क्षात्र धरम रो नेमी हो 
राणा रो प्रेम पुजारी हो ,
बैरयां रै मन रो कांटो हो बीकाणूं पूत खरारो हो ,
राठौड रणां मे रातो हो बस सागी तेज दुधारो हो,
आ बात पातस्या जाणै हो 
घावां पर लूण लगावण नै ,
पीथळ नै तुरत बुलायो हो ,
पण टूट गयो बीं राणा रो 
तूं भाट बण्यो बिड्दावै हो ,
मैं आज तपस्या धरती रो मेवाडी पाग़ पग़ां मे है ,
अब  बात मनै किण रजवट रै रजपूती खून रगां मे है ?
जद पीथळ कागद ले देखी 
राणा री सागी सैनाणी ,
नीवै स्यूं धरती खसक गई 
अंाख्यां मे आयो भर पाणी ,
पण फ़ेर कही ततकाल संभल आ बात सफ़ा ही झूठी है ,
राणा री पाग़ सदा ऊंची राणा री आण अटूटी है ।
ल्यो हुकम हुवै तो लिख पूछूं 
राणा ने कागद  खातर ,
लै पूछ भलांई पीथळ तूं 
आ बात सही बोल्यो अकबर ,
म्हे आज सुणी है नाहरियो 
स्याळां  रे सागे सोवैलो ,
म्हे आज सुणी है सूरजडो 
बादळ री ओटां खोवैलो ,
म्हे आज सुणी है चातकडो 
धरती रो पाणी पीवैलो ,
म्हे आज सुणी है हाथीडो 
कूकर री जूणां जीवैलो ,
म्हे आज सुणी है थकां खसम 
अब रांड हुवेली रजपूती ,
म्हे आज सुणी है म्यानां में 
तलवार रवैली अब सूती ,
तो म्हारो हिवडो कांपै है मूंछयां री मोड मरोड गई,
पीथळ नै राणा लिख भेजो आ बाट कठै तक गिणां सही ?
पीथळ रा आखर पढ़तां ही 
राणा री अंाख्यां लाल हुई ,
धिक्कार मनै हूं कायर हूं 
नाहर री एक दकाल हुई ,
हूं भूख मरुं हूं प्यास मरुं 
मेवाड धरा आजाद रवै 
हूं घोर उजाडा मे भटकूं 
पण मन में मां री याद रवै ,
हूं रजपूतण रो जायो हूं रजपूती करज चुकाऊंला,
ओ सीस पडै पण पाघ़ नही दिल्ली रो मान झुकाऊंला ।
पीथळ के खिमता बादळ री 
जो रोकै सूड़ ऊगाळी नै ,
सिंघा री हाथळ सह लेवै 
बा कूख मिली कद स्याळी नै ?
धरती रो पाणी पिवै इसी 
चातग री चूंच बणी कोनी ,
कूकर री जूणां जिवै इसी 
हाथी री बात सुणी कोनी,
आं हाथां मे तलवार थकां 
कुण रांड कवै है  रजपूती ?
म्यानां रैै बदळै बैरयां री 
छात्यां मे रेवै ली सूती ,
मेवाड धधकतो अंगारो आंध्यां मे चमचम चमकैलो,
कडखै री उठती तानां पर पग पग खांडो खडकैलो ,
राखो थे मंूछयां  एठयोडी 
लोही री नदी बहा दंयूला ,
हूं अथक लडूंला अकबर स्यूं 
उजड्यो मेवाड बसा दयूंला ,
जद राणा रो संदेशो गयो पीथळ री छाती दूणी ही ,
हिंदवाणो सूरज चमकै हो अकबर री दुनियां सूनी ही ।

मेवाड की पवित्र धरती के कण कण मे भारत के सपूत महाराणा प्रताप का व्यक्तित्व, कृतित्व औंर उनके त्यागमयी जीवन कि अमर कहानी के जयघोष आज भी व्यापत हैं। उनके विषय मे पृथ्वीराज राठौंड ने लिखा हैं।
माई एडा पूत जण,जेहडा राणा प्रताप । 
अकबर सूतौं औंझके जाणा सिराणे सांप ।।
उनका जीवन चरित्र देशवासियो मे वीर भावना, सांस्कृतिक चेतना ,कर्त्तव्य बोध पैदा करने  के लिये धधकते ज्वालामुखी का काम कर सकता हैं। देशरक्षा हेतु उन्होने भौंतिक सुख सुविधाओ व महलो के ऐश्‍वर्य का भी त्याग कर दिया पहाडीयो मे शरण ली जहँा उन्हे खाने के लिये रोटी भी नसीब नही हुई परन्तु उन्होने अकबर की अधीनता स्वीकार नही की  । उन्होने कहा-
मैं राज्यसुख भोग करु, चित्तौंड गौंरव नष्ट हो। 
मुख मोड लू कर्त्तव्य से क्या देश मेरा भ्रष्ट हो ।।
आज के युग मे भी महाराणा प्रताप के स्वतन्त्रता के सिद्धान्तो का महत्व औंर ज्यादा बढ़ गया हैं । हमने अपने प्रयासो द्वारा नई नई तकनीके विकसित करके कई महत्वपूर्ण अविष्कार किये हैं जो हमारे लिये लाभदायक हैं औंर हमारे जीवन का अभिन्न अंग बन गए हैं।आज देश मे भौंतिक सुविधाओ की कमी नही हैं।  हमने टी. वी. वाहन कम्प्यूटर ,मोबाईल  आदि वस्तुओ का सर्जन किया हैं। इनके माध्यम से देश विदेश की जानकारी घर बैंठे मिल जाती हैं। ये हमारे मनोरंजन का भी साधन बन गये हैं।इनसे मिलने वाली शिक्षाप्रद जानकारी से हमारे व्यक्त्तिव व मानसिकता का विकास हो रहा हैं। हमने कृषि यंत्रो ,व उर्वरक खादो का निर्माण करके उत्पादकता व खाधानो पर आत्मनिर्भरता बढ़ा ली हैं।इन सब के फ़ायदो के साथ साथ कुछ दुष्परिणाम भी सामने आये हैं।।एक तरफ़ हमने प्रकृति को नियन्त्रित  करने का प्रयास किया हैं वही दूसरी औंर  वाहनो व बडी बडी मीलो  से निकलने वाले धंुवे व जहरीली गैंस से प्रदुषण, व कई नाईलाज घातक बिमारियो को उत्पन्न करके पर्यावरणीय सन्तुलन को बिगाडा हैं।
आज हमाने तकनीकी द्वारा कई नाभिकीय योजनाए व परमाणु शक्त्ति का तो विकास कर लिया हैं पर कई हिंसक प्रवृतियो को भी अंजाम दिया हैं जिससे हमारे सामाजिक सांस्कृतिक ,धार्मिक मूल्यो का हास हो रहा हैं। आज हम भौंतिक सुविधाओ व टेक्नोलोजी के गुलाम होते जा रहे हैं इन सब ने हमारी मानसिकता पर गलत प्रभाव डाला  हैं ।
आज विश्वीकरण के दौंरान देश मे राजनितिक ,आर्थिक, भोगोलिक ,सांस्कृतिक पर्यावरणीय बदलाव आया हैं हमने पर्यावरण को बुरी तरह नष्ट किया हैं व आने वाली पीढ़ियो के जीवन को खराब कर रहे हैं।आज भारत की तुलना विकसित देशो से कि जा रही हैं। । नई नई कम्पनिया भारत मे अपने पावं जमा रही हैं औंर लोगो मे आर्कषण का केन्द्र बन रही हैं। क्या हम कोई नयी गुलामी की औंर रो नही बढ़ रहे हैं।
आज कई विदेशी टी.वी.चैंनलो, पत्र पत्रिकाओ द्वारा मन मस्तिष्क को विकृत करने वाले कार्यक्रम प्रसारित किये जा रहे हैं इनसे  हमारे पेहनावे, रहन सहन, मे परिर्वतन आ गया हैं जिनसे नैंतिक मूल्यो व सांस्कृतिक गौंरव का हास हो रहा हैं । कुछ मीडिया वालो का रोल भी निन्दनीय हैं ये लोग जनता को हकीकत से रुबरु नही करवाते बल्कि सच्चाई छुपाकर कुछ औंर ही दिखाते हैं। ये समाज मे विकृतता व मनमुटाव पैंदा करते हैं। हमारे मन मस्तिष्क पर अब पाश्चात्य  भाषा संस्कृति व शिक्षा का प्रभुत्व बढ़ रहा हैं हिन्दी स्कूलो के तुलना मे अंग्रेजी माध्यम की स्कुलो मे ही माता पिता अपने बच्चो को भेजना पसंद करते हैं।कई लोग मातृ भाषा बोलने मे शर्म महसुस करते हैं।
महाराणा प्रताप के चरित्र  मे सर्वधर्मसम्भावना के लक्षण परिलक्षित होते हैं वे अपनी प्रजा को समानता से देखते व उनके हितो को सर्वोपरि मानते थे उनके काल मे राजनितिक स्थिती सराहनीय थी परन्तु वर्तमान राजनीति मे भ्रष्टाचार व्यापत हैं ।प्रशासनिक सेवाओ व रोजगार के लिए बौंद्धिक क्षमता व शिक्षण योग्यता की बजाय जाति के नाम पर आरक्षण दिया जाता हैं।
पश्चिमी संस्कृति का प्रभाव लोगो के दिल दिमागो पर छाया हुआ हैं । लोग पश्चिमी संस्कृति को अपनाकर  गर्व महसुस करते हैं जो गलत हैं।हर कोई क्रिकेट का दिवाना बन रहा हैं जिससे हमारे पारम्परिक खेल धीरे धीरे नष्ट प्राय हो रहे हैं। क्या ये अंग्रेजो का खेल हमे नयी गुलामी की औंर नही ले जा रहा हैं ।भारत ने जब परमाणु विस्फ़ोट करने का प्रयास किया तो कई विदेशी दबाव डाले गये, वे उन लोगो द्वारा जिन के पास परमाणु शक्त्ति हैं।  देश की एतिहासिक धरोहर ,जैंसे महल ,दुर्ग को आज रिसोर्ट व होटल मे बदलने का विचार विदेशी विशेषज्ञो की ही देन हैं।
अगर हमे हमारे देश का चहुमुखी विकास करना हैं तो हम सब को संगठित होना होगा व स्वदेश प्रेम की भावना को महत्व देना होगा । माना कि हममे  पश्चमी सभ्यता व संस्कृति की अच्छी बाते  ग्रहण करने की भावना होनी चाहिये परन्तु साथ ही साथ महाराणा प्रताप जैंसे शुरवीरो के त्याग समर्पण मूल्यो का भी अनुसरण करना चाहिए। हमे विश्वी करण के इस जमाने मे भी अपनी संस्कृति की  अलग ही पहचान बनानी चाहिये । हमारा ये निर्णय समाज सुधार की दिशा मे अतयन्त महत्वपुर्ण कदम होगा । इसके लिए हमे महाराणा प्रताप के आदर्शो ,कष्टसहिष्णुता ,त्याग, शुरवीरता आदि गुणो को हमारे जीवन मे उतारना होगा।
विश्वीकरण व संस्कृतिकरण साथ साथ चलने चाहिये। विश्वीकरण होने के बावजूद हमे हमारे राष्ट्र ,हमारे समाज ,हमारे परिवार इन सब पर हमे पूर्ण विश्वास होना चाहिए ।इन सब के बारे मे निर्णय लेने व उसका भला बुरा सोचने की हिम्मत ,क्षमता व स्वतन्त्रता हैं। इस पुण्य अवसर पर आइये हम प्रतिज्ञा करे कि महाराणा प्रताप की दी हुई स्वतन्त्रता को विश्वीकरण के सन्दर्भ मे संझोने का प्रयास करे।
लेख : चेतक रे लाग्या पंख 
संदर्भ, राजस्थान पत्रिका अहमदाबाद, 10 नवम्बर, पेज-1।
काठियावाडी समेत भारतीय नस्ल रे घोडा पर डाक टिकट जारी
चेतक रे पंख लाग गिया। अबे चेतक डाक रे जरिये देश भर में उड सकेगा।
अटे चेतक सु मतलब है भारतीय नस्ल रा लुप्तप्राय घोडा। चेतक महाराणा प्रताप रो जांबाज घोडो हो और काठियावाडी हो। भारतीय डाक विभाग सोमवार ने काठियावाडी- मारवाडी समेत घोडा री चार लुप्तप्राय नस्ला पर डाक टिकट जारी करिया।
इण डाक टिकट पर काठियावाडी, मारवाडी, जंसकारी और मणिपुरी घोडा है, जिका भारत में लुप्तप्राय होता जा रिया है। अहमदाबाद में कार्यरत डाक विभाग रा अधिकारी संदीप ब्रह्मभट्ट रे विशेष प्रयासा सु भारतीय नस्ल रे घोडा पर डाक टिकट जारी हुया है।
समारोह में गुजरात डाक परिमंडल री मुख्य पोस्ट मास्टर जनरल करुणा पिल्लै समेत डाक विभाग और विण सु जुडया फिलाटेलिक विभाग रा वरिष्ठ अधिकारी मौजूद हा। राधिका दोराईस्वामी जठे संदीप भ्रह्मभट्ट रे प्रयासा री सराहना करी, बठे इण बात री खुशी जाहिर करी कि डाक विभाग इसा घोडा पर डाक टिकट जारी कर रियो है, जिका ने बचाणे री महती आवश्यकता है। वा उम्मीद जताई कि डाक टिकट जारी होणे सु लोगा में इण घोडा रे संरक्षण रे प्रति जागरुकता आवेगी। इणसु पेली संदीप जी केयो कि डाक विभाग जद कोई टिकट जारी करे है, तो बो फौरी तौर पर नीं बल्कि गहन मंथन रे बाद होवे है। जद इया किणी पर डाक टिकट जारी होवे है तो  विण री महत्ता ने खुद हि समझो जा सके है। बे इण वास्ते लारले 5 साला सु प्रयास कर रिया हा अर आज जार वियारो प्रयास साकार हुयो, तो इणसु भारतीय नसल रे घोडा री महता अपने आप स्पष्ट है। वा केयो कि आ और भी गर्व री बात है कि जिण चार नसला रे घोडा प र टिकट जारी हो रियो है, उणमें काठियावाडी भी शामिल है।